Sahir Ludhianvi Poetry

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

गो हम से भागती रही ये तेज़-गाम उम्र
ख़्वाबों के आसरे पे कटी है तमाम उम्र

ज़ुल्फ़ों के ख़्वाब, होंठों के ख़्वाब, और बदन के ख़्वाब
मेराज-ए-फ़न के ख़्वाब, कमाल-ए-सुख़न के ख़्वाब

तहज़ीब-ए-ज़िन्दगी के, फ़रोग़-ए-वतन के ख़्वाब
ज़िन्दाँ के ख़्वाब, कूचा-ए-दार-ओ-रसन के ख़्वाब

ये ख़्वाब ही तो अपनी जवानी के पास थे
ये ख़्वाब ही तो अपने अमल के असास थे
ये ख़्वाब मर गये हैं तो बे-रंग है हयात
यूँ है कि जैसे दस्त-ए-तह-ए-सन्ग है हयात

आओ कि कोई ख़्वाब बुनें कल के वास्ते
वरना ये रात आज के संगीन दौर की
डस लेगी जान-ओ-दिल को कुछ ऐसे कि जान-ओ-दिल
ता-उम्र फिर न कोई हसीं ख़्वाब बुन सकें

अपने माज़ी के तसव्वुर से हिरासा हूँ मैं 
अपने गुज़रे हुए अय्यम से नफ़रत है मुझे 
अपनी बेकार तमन्नओं पे शर्मिंदा हूँ मैं 
अपनी बेसुध उम्मीदों पे निदामत है मुझे 

मेरे माज़ी को अंधेरे में दबा रहने दो 
मेरा माज़ी मेरी ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहीं 
मेरी उम्मीदों का हासिल मेरी काचाह का सिला 
एक बेनाम अज़ीयत के सिवा कुछ भी नहीं 
कितनी बेकार उम्मीदों का सहारा लेकर 
मैंने ऐवान सजाये थे किसी की ख़ातिर 
कितनी बेरब्त तमन्नाओं के माभम ख़ाके
अपने ख़्वाबों मे बसाये थे किसी की ख़ातिर 
मुझसे अब मेरी मोहब्बत के फ़साने न पूछो 
मुझको कहने दो के मैंने उन्हें चाहा ही नहीं 
और वो मस्त निगाहें जो मुझे भूल गई 
मैंने उन मस्त निगाहों को सराहा ही नहीं 
मुझको कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूँ 
इश्क़ नाकाम सही ज़िन्दगी नाकाम नहीं 
उनको अपनाने की ख़्वाहिश उन्हें पाने की तलब 
शौक़ बेकार सही सै-ग़म अंजाम नहीं 
वही गेसू वही नज़र वही आरिद वही जिस्म 
मैं जो चाहूँ कि मुझे और भी मिल सकते हैं 
वो कँवल जिनको कभी मुनके लिये खिलना था 
उनकी नज़रों से बहुत दूर भी खिल सकते हैं