ख के जंगल में फिरते हैं कब से मारे मारे लोग 
जो होता है सह लेते हैं कैसे हैं बेचारे लोग 

जीवन-जीवन हमने जग में खेल यही होते देखा 
धीरे-धीरे जीती दुनिया धीरे-धीरे हारे लोग

वक़्त सिंहासन पर बैठा है अपने राग सुनाता है
संगत देने को पाते हैं साँसों के इकतारे लोग

नेकी इक दिन काम आती है हमको क्या समझाते हो
हमने बेबस मरते देखे कैसे प्यारे-प्यारे लोग

इस नगरी में क्यों मिलती है रोटी सपनों के बदले 
जिनकी नगरी है वो जानें हम ठहरे बँजारे लोग

Related Javed Akhtar Ghazal :

फिरते हैं कब से दर-बदर अब इस नगर अब उस नगर
इक दूसरे के हमसफ़र मैं और मिरी आवारगी
नाआश्ना हर रहगुज़र नामेहरबां हर इक नज़र
जाएँ तो अब जाएँ किधर मैं और मिरी आवारगी

हम भी कभी आबाद थे ऐसे कहाँ बरबाद थे
बेफ़िक्र थे आज़ाद थे मसरूर थे दिलशाद थे
वो चाल ऐसी चल गया हम बुझ गये दिल जल गया
निकले जलाके अपना घर मैं और मिरी आवारगी

जीना बहुत आसान था इक शख़्स का एहसान था
हमको भी इक अरमान था जो ख़्वाब का सामान था
अब ख़्वाब हैं न आरज़ू अरमान है न जुस्तजू
यूँ भी चलो ख़ुश हैं मगर मैं और मिरी आवारगी

वो माहवश वो माहरू वो माहे कामिल हू-बहू
थीं जिस की बातें कू-बकू उससे अजब थी गुफ़्तगू
फिर यूँ हुआ वो खो गई तो मुझको ज़िद सी हो गई
लायेंगे उस को ढूँढकर मैं और मिरी आवारगी

ये दिल ही था जो सह गया वो बात ऐसी कह गया
कहने को फिर क्या रह गया अश्कों का दरिया बह गया
जब कहके वो दिलबर गया तेरे लिये मैं मर गया
रोते हैं उसको रात भर मैं और मिरी आवारगी

अब ग़म उठायें किसलिये आँसू बहाएँ किसलिये
ये दिल जलाएँ किसलिये यूँ जाँ गवायें किसलिये
पेशा न हो जिसका सितम ढूँढेगे अब ऐसा सनम
होंगे कहीं तो कारगर मैं और मिरी आवारगी

आसार हैं सब खोट के इमकान हैं सब चोट के
घर बंद हैं सब गोट के अब ख़त्म है सब टोटके
क़िस्मत का सब ये फेर है अँधेर ही अँधेर है
ऐसे हुए हैं बेअसर मैं और मिरी आवारगी

जब हमदमो हमराज़ था तब और ही अन्दाज़ था
अब सोज़ है तब साज़ था अब शर्म है तब नाज़ था
अब मुझसे हो तो हो भी क्या है साथ वो तो वो भी क्या
इक बेहुनर इक बेसमर मैं और मिरी आवारगी

मुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं 
जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ रहती थीं 

एक ये दिन जब अपनों ने भी हमसे नाता तोड़ लिया 
एक वो दिन जब पेड़ की शाख़ें बोझ हमारा सहती थीं 

एक ये दिन जब सारी सड़कें रूठी-रूठी लगती हैं 
एक वो दिन जब 'आओ खेलें' सारी गलियाँ कहती थीं 

एक ये दिन जब जागी रातें दीवारों को तकती हैं 
एक वो दिन जब शामों की भी पलकें बोझल रहती थीं

एक ये दिन जब ज़हन में सारी अय्यारी की बातें हैं 
एक वो दिन जब दिल में भोली-भाली बातें रहती थीं

एक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आँसू का 
एक वो दिन जब एक ज़रा सी बात पे नदियाँ बहती थीं 

एक ये घर जिस घर में मेरा साज़-ओ-सामाँ रहता है 
एक वो घर जिस घर में मेरी बूढ़ी नानी रहती थीं