दिल का दयार-ए-ख़्वाब में दूर तलक गुज़र रहा
पाँव नहीं थे दरमियाँ आज बड़ा सफ़र रहा

हो न सका हमें कभी अपना ख़याल तक नसीब
नक़्श किसी ख़याल का लौह-ए-ख़याल पर रहा

नक़्श-गरों से चाहिए नक़्श ओ निगार का हिसाब
रंग की बात मत करो रंग बहुत बिखर रहा

जाने गुमाँ की वो गली ऎसी जगह है कौन सी
देख रहे हो तुम के मैं फिर वहीं जा के मर रहा

दिल मेरे दिल मुझे भी तुम अपने ख़्वास में रखो
याराँ तुम्हारे बाब में मैं ही न मोतबर रहा

शहर-ए-फ़िराक़-ए-यार से आई है इक ख़बर मुझे
कूचा-ए-याद-ए-यार से कोई नहीं उभर रहा
श्रेणी: ग़ज़ल

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अपना ख़ाका लगता हूँ
एक तमाशा लगता हूँ

आईनों को ज़ंग लगा
अब मैं कैसा लगता हूँ

अब मैं कोई शख़्स नहीं
उस का साया लगता हूँ

सारे रिश्ते तिश्ना हैं
क्या मैं दरिया लगता हूँ

उस से गले मिल कर ख़ुद को
तनहा तनहा लगता हूँ

ख़ुद को मैं सब आँखों में
धुँदला धुँदला लगता हूँ

मैं हर लम्हा इस घर से
जाने वाला लगता हूँ

क्या हुए वो सब लोग के मैं
सूना सूना लगता हूँ

मसलहत इस में क्या है मेरी
टूटा फूटा लगता हूँ

क्या तुम को इस हाल में भी
मैं दुनिया का लगता हूँ

कब का रोगी हूँ वैसे
शहर-ए-मसीहा लगता हूँ

मेरा तालू तर कर दो
सच-मुच प्यासा लगता हूँ

मुझ से कमा लो कुछ पैसे
ज़िंदा मुर्दा लगता हूँ

मैं ने सहे हैं मक्र अपने
अब बे-चारा लगता हूँ.

हालत-ए-हाल के सबब, हालत-ए-हाल ही गई
शौक़ में कुछ नहीं गया, शौक़ की ज़िंदगी गई

एक ही हादिसा तो है और वो ये के आज तक
बात नहीं कही गयी, बात नहीं सुनी गई

बाद भी तेरे जान-ए-जान दिल में रहा अजब सामान
याद रही तेरी यहाँ, फिर तेरी याद भी गई

उसके बदन को दी नमूद हमने सुखन में और फिर
उसके बदन के वास्ते एक काबा भी सी गई

उसकी उम्मीद-ए-नाज़ का हमसे ये मान था के आप
उम्र गुज़ार दीजिये, उम्र गुज़ार दी गई

उसके विसाल के लिए, अपने कमाल के लिए
हालत-ए-दिल की थी खराब, और खराब की गई

तेरा फ़िराक जान-ए-जान ऐश था क्या मेरे लिए
यानी तेरे फ़िराक में खूब शराब पी गई

उसकी गली से उठ के मैं आन पडा था अपने घर
एक गली की बात थी और गली गली गई

रंज है हालत-ए-सफ़र हाल-ए-क़याम रंज है
सुब्ह-ब-सुब्ह रंज है शाम-ब-शाम रंज है

उस की शमीम-ए-ज़ुल्फ़ का कैसे हो शुक्रिया अदा
जब के शमीम रंज है जब के मशाम रंज है

सैद तो क्या के सैद-कार ख़ुद भी नहीं ये जानता
दाना भी रंज है यहाँ यानी के दाम रंज है

मानी-ए-जावेदान-ए-जाँ कुछ भी नहीं मगर ज़ियाँ
सारे कलीम हैं ज़ुबूँ सारा कलाम रंज है

बाबा अलिफ़ मेरी नुमूद रंज है आप के ब-क़ौल
क्या मेरा नाम भी है रंज हाँ तेरा नाम रंज है

कासा गदा-गरी का है नाफ़ प्याला यार का
भूक है वो बदन तमाम वस्ल तमाम रंज है

जीत के कोई आए तब हार के कोई आए तब
जौहर-ए-तेग़ शर्म है और नियाम रंज है

दिल ने पढ़ा सबक़ तमाम बूद तो है क़लक़ तमाम
हाँ मेरा नाम रंज है हाँ तेरा नाम रंज है

पैक-ए-क़ज़ा है दम-ब-दम 'जौन' क़दम क़दम शुमार
लग़्ज़िश-ए-गाम रंज है हुस्न-ए-ख़िराम रंज है

बाबा अलिफ़ ने शब कहा नश्शा-ब-नश्शा कर गिले
जुरआ-ब-जुरआ रंज है जाम-ब-जाम रंज है

आन पे हो मदार क्या बूद के रोज़गार का
दम हमा-दम है दूँ ये दम वहम-ए-दवाम रंज है

रज़्म है ख़ून का हज़र कोई बहाए या बहे
रुस्तम ओ ज़ाल हैं मलाल यानी के साम रंज है

दीद की एक आन में कार-ए-दवाम हो गया
वो भी तमाम हो गया मैं भी तमाम हो गया

अब मैं हूँ इक अज़ाब में और अजब अज़ाब में
जन्नत-ए-पुर-सुकूत में मुझ से कलाम हो गया

आह वो ऐश-ए-राज़-ए-जाँ है वो ऐश-ए-राज़-ए-जाँ
है वो ऐश-ए-राज़-ए-जाँ शहर में आम हो गया

रिश्ता-ए-रंग-ए-जाँ मेरा निकहत-ए-नाज़ से तेरी
पुख़्ता हुआ और इस क़दर यानी के ख़ाम हो गया

पूछ न वस्ल का हिसाब हाल है अब बहुत ख़राब
रिश्ता-ए-जिस्म-ओ-जाँ के बीच जिस्म हराम हो गया

शहर की दास्ताँ न पूछ है ये अजीब दास्ताँ
आने से शहरयार के शहर ग़ुलाम हो गया

दिल की कहानियाँ बनीं कूचा-ब-कूचा कू-ब-कू
सह के मलाल-ए-शहर को शहर में नाम हो गया

'जौन' की तिश्नगी का था ख़ूब ही माजरा के जो
मीना-ब-मीना मय-ब-मय जाम-ब-जाम हो गया

नाफ़-प्याले को तेरे देख लिया मुग़ाँ ने जान
सारे ही मय-कदे का आज काम तमाम हो गया

उस की निगाह उठ गई और में उठ के रह गया
मेरी निगाह झुक गई और सलाम हो गया.

जाने कहाँ गया वो वो जो अभी यहाँ था
वो जो अभी यहाँ था वो कौन था कहाँ था

ता लम्हा-ए-गुज़िश्ता ये जिस्म और साए
ज़िंदा थे राएगाँ में जो कुछ था राएगाँ था

अब जिस की दीद का है सौदा हमारे सर में
वो अपनी ही नज़र में अपना ही इक सामाँ था

क्या क्या न ख़ून थूका मैं उस गली में यारो
सच जानना वहाँ तो जो फ़न था राएगाँ था

ये वार कर गया है पहलू से कौन मुझ पर
था मैं ही दाएँ बाएँ और मैं ही दरमियाँ था

उस शहर की हिफाज़त करनी थी हम को जिस में
आँधी की थीं फ़सीलें और गर्द का मकाँ था

थी इक अजब फ़ज़ा सी इमकान-ए-ख़ाल-ओ-ख़द की
था इक अजब मुसव्विर और वो मेरा गुमाँ था

उम्रें गुज़र गई थीं हम को यक़ीन से बिछड़े
और लम्हा इक गुमाँ का सदियों में बे-अमाँ था

जब डूबता चला मैं तारीकियों की तह में
तह में था इक दरीचा और उस में आसमाँ था