ā.īnoñ ko zañg lagā
ab maiñ kaisā lagtā huuñ

Related Jaun Eliya Ghazal :

हालत-ए-हाल के सबब, हालत-ए-हाल ही गई
शौक़ में कुछ नहीं गया, शौक़ की ज़िंदगी गई

एक ही हादिसा तो है और वो ये के आज तक
बात नहीं कही गयी, बात नहीं सुनी गई

बाद भी तेरे जान-ए-जान दिल में रहा अजब सामान
याद रही तेरी यहाँ, फिर तेरी याद भी गई

उसके बदन को दी नमूद हमने सुखन में और फिर
उसके बदन के वास्ते एक काबा भी सी गई

उसकी उम्मीद-ए-नाज़ का हमसे ये मान था के आप
उम्र गुज़ार दीजिये, उम्र गुज़ार दी गई

उसके विसाल के लिए, अपने कमाल के लिए
हालत-ए-दिल की थी खराब, और खराब की गई

तेरा फ़िराक जान-ए-जान ऐश था क्या मेरे लिए
यानी तेरे फ़िराक में खूब शराब पी गई

उसकी गली से उठ के मैं आन पडा था अपने घर
एक गली की बात थी और गली गली गई

शर्मिंदगी है हम को बहुत हम मिले तुम्हें
तुम सर-ब-सर ख़ुशी थे मगर ग़म मिले तुम्हें

मैं अपने आप में न मिला इस का ग़म नहीं
ग़म तो ये है के तुम भी बहुत कम मिले तुम्हें

है जो हमारा एक हिसाब उस हिसाब से
आती है हम को शर्म के पैहम मिले तुम्हें

तुम को जहान-ए-शौक़-ओ-तमन्ना में क्या मिला
हम भी मिले तो दरहम ओ बरहम मिले तुम्हें

अब अपने तौर ही में नहीं तुम सो काश के
ख़ुद में ख़ुद अपना तौर कोई दम मिले तुम्हें

इस शहर-ए-हीला-जू में जो महरम मिले मुझे
फ़रियाद जान-ए-जाँ वही महरम मिले तुम्हें

देता हूँ तुम को ख़ुश्की-ए-मिज़गाँ की मैं दुआ
मतलब ये है के दामन-ए-पुर-नम मिले तुम्हें

मैं उन में आज तक कभी पाया नहीं गया
जानाँ जो मेरे शौक़ के आलम मिले तुम्हें

तुम ने हमारे दिल में बहुत दिन सफ़र किया
शर्मिंदा हैं के उस में बहुत ख़म मिले तुम्हें

यूँ हो के और ही कोई हव्वा मिले मुझे
हो यूँ के और ही कोई आदम मिले तुम्हें

हालत-ए-हाल के सबब हालत-ए-हाल ही गई 
शौक़ में कुछ नहीं गया शौक़ की ज़िंदगी गई

एक ही हादसा तो है और वो यह के आज तक
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई

बाद भी तेरे जान-ए-जां दिल में रहा अजब समाँ
याद रही तेरी यां फिर तेरी याद भी गई

सैने ख्याल-ए-यार में की ना बसर शब्-ए-फिराक 
जबसे वो चांदना गया तबसे वो चांदनी गयी 

उसके बदन को दी नुमूद हमने सुखन में और फिर
उसके बदन के वास्ते एक कबा भी सी गयी

उसके उम्मीदे नाज़ का हमसे ये मान था की आप
उम्र गुज़ार दीजिये, उम्र गुज़ार दी गयी

उसके विसाल के लिए अपने कमाल के लिए
हालत-ए-दिल की थी खराब और खराब की गई

तेरा फिराक़ जान-ए-जां ऐश था क्या मेरे लिए
यानी तेरे फिराक़ में खूब शराब पी गई

उसकी गली से उठके मैं आन पड़ा था अपने घर
एक गली की बात थी और गली गली गयी

गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैं ने
वो कौन है जिसे देखा नहीं कभी मैं ने

तेरा ख़याल तो है पर तेरा वजूद नहीं
तेरे लिए तो ये महफ़िल सजाई थी मैं ने

तेरे अदम को गवारा न था वजूद मेरा
सो अपनी बेख़-कनी में कमी न की मैं ने

हैं मेरी ज़ात से मंसूब सद-फ़साना-ए-इश्क़
और एक सतर भी अब तक नहीं लिखी मैं ने

ख़ुद अपने इश्वा ओ अंदाज़ का शहीद हूँ मैं
ख़ुद अपनी ज़ात से बरती है बे-रुख़ी मैं ने

मेरे हरीफ़ मेरी यक्का-ताज़ियों पे निसार
तमाम उम्र हलीफ़ों से जंग की मैं ने

ख़राश-ए-नग़मा से सीना छिला हुआ है मेरा
फ़ुग़ाँ के तर्क न की नग़मा-परवरी मैं ने

दवा से फ़ाएदा मक़सूद था ही कब के फ़क़त
दवा के शौक़ में सेहत तबाह की मैं ने

ज़बाना-ज़न था जिगर-सोज़ तिश्नगी का अज़ाब
सो जौफ़-ए-सीना में दोज़ख उंड़ेल ली मैं ने

सुरूर-ए-मय पे भी ग़ालिब रहा शूऊर मेरा
के हर रिआयत-ए-ग़म ज़हन में रखी मैं ने

ग़म-ए-शुऊर कोई दम तो मुझ को मोहलत दे
तमाम उम्र जलाया है अपना जी मैं ने

इलाज ये है के मजबूर कर दिया जाऊँ
वगर्ना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैं ने

रहा मैं शाहिद-ए-तन्हा नशीन-ए-मसनद-ए-ग़म
और अपने कर्ब-ए-अना से ग़रज़ रखी मैं ने

रंज है हालत-ए-सफ़र हाल-ए-क़याम रंज है
सुब्ह-ब-सुब्ह रंज है शाम-ब-शाम रंज है

उस की शमीम-ए-ज़ुल्फ़ का कैसे हो शुक्रिया अदा
जब के शमीम रंज है जब के मशाम रंज है

सैद तो क्या के सैद-कार ख़ुद भी नहीं ये जानता
दाना भी रंज है यहाँ यानी के दाम रंज है

मानी-ए-जावेदान-ए-जाँ कुछ भी नहीं मगर ज़ियाँ
सारे कलीम हैं ज़ुबूँ सारा कलाम रंज है

बाबा अलिफ़ मेरी नुमूद रंज है आप के ब-क़ौल
क्या मेरा नाम भी है रंज हाँ तेरा नाम रंज है

कासा गदा-गरी का है नाफ़ प्याला यार का
भूक है वो बदन तमाम वस्ल तमाम रंज है

जीत के कोई आए तब हार के कोई आए तब
जौहर-ए-तेग़ शर्म है और नियाम रंज है

दिल ने पढ़ा सबक़ तमाम बूद तो है क़लक़ तमाम
हाँ मेरा नाम रंज है हाँ तेरा नाम रंज है

पैक-ए-क़ज़ा है दम-ब-दम 'जौन' क़दम क़दम शुमार
लग़्ज़िश-ए-गाम रंज है हुस्न-ए-ख़िराम रंज है

बाबा अलिफ़ ने शब कहा नश्शा-ब-नश्शा कर गिले
जुरआ-ब-जुरआ रंज है जाम-ब-जाम रंज है

आन पे हो मदार क्या बूद के रोज़गार का
दम हमा-दम है दूँ ये दम वहम-ए-दवाम रंज है

रज़्म है ख़ून का हज़र कोई बहाए या बहे
रुस्तम ओ ज़ाल हैं मलाल यानी के साम रंज है

सर येह फोड़िए अब नदामत में
नीन्द आने लगी है फुरकत में 

हैं दलीलें तेरे खिलाफ मगर
सोचता हूँ तेरी हिमायत में

इश्क को दरम्यान ना लाओ के मैं
चीखता हूँ बदन की उसरत में

ये कुछ आसान तो नहीं है कि हम 
रूठते अब भी है मुर्रबत में

वो जो तामीर होने वाली थी 
लग गई आग उस इमारत में

वो खला है कि सोचता हूँ मैं
उससे क्या गुफ्तगू हो खलबत में 

ज़िन्दगी किस तरह बसर होगी 
दिल नहीं लग रहा मुहब्बत में

मेरे कमरे का क्या बया कि यहाँ
खून थूका गया शरारत में 

रूह ने इश्क का फरेब दिया 
ज़िस्म को ज़िस्म की अदावत में 

अब फकत आदतो की वर्जिश है 
रूह शामिल नहीं शिकायत में 

ऐ खुदा जो कही नहीं मौज़ूद 
क्या लिखा है हमारी किस्मत में

जी ही जी में वो जल रही होगी
चाँदनी में टहल रहीं होगी 

चाँद ने तान ली है चादर-ए-अब्र
अब वो कपड़े बदल रही होगी 

सो गई होगी वो शफ़क़ अन्दाम
सब्ज़ किन्दील जल रही होगी

सुर्ख और सब्ज़ वादियों की तरफ
वो मेरे साथ चल रही होगी 

चढ़ते-चढ़ते किसी पहाड़ी पर 
अब तो करवट बदल रही होगी 

नील को झील नाक तक पहने 
सन्दली जिस्म मल रही होगी 

2.

गाहे-गाहे बस अब तही हो क्या 
तुम से मिल कर बहुत खुशी हो क्या

मिल रही हो बड़े तपाक के साथ
मुझ को अक्सर भुला चुकी हो क्या

याद हैं अब भी अपने ख्वाब तुम्हें 
मुझ से मिलकर उदास भी हो क्या

बस मुझे यूँ ही एक ख़याल आया
सोचती हो तो सोचती हो क्या 

अब मेरी कोई ज़िन्दगी ही नहीं 
अब भी तुम मेरी ज़िन्दगी हो क्या 

क्या कहा इश्क जाबेदानी है
आखरी बार मिल रही हो क्या?

है फज़ा याँ की सोई-सोई सी 
तुम बहुत तेज़ रोशनी हो क्या

मेरे सब तंज़ बेअसर ही रहे
तुम बहुत दूर जा चुकी हो क्या?

दिल में अब सोज़े-इंतज़ार नहीं
शम्मे उम्मीद बुझ गई हो क्या?