Spring is in air, Fresh blossoms everywhere. 
Sending you my warm greetings on the 
auspicious occasion of Vasant Panchami!

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तीन बाई दो की उस पथरीली बेंच पर
तुमने बैठते ही पूछा था कि
बसन्त से पहले झड़े हुए पत्‍तों का
उल्काओं से क्या रिश्ता है
पसोपेश में पड़ गया था मैं यह सोचकर कि
उल्काएँ कौनसे बसंत के पहले गिरती हैं कि
पृथ्वी के अलावा सृष्टि में और कहाँ आता है बसन्त
चंद्रमा से पूछा मैंने तो उसने कहा 
‘मैं तो ख़ुद रोज़-रोज़ झड़ता हूँ
मेरे यहाँ हर दूसरे पखवाड़े बसन्त आता है
लेकिन उल्काओं के बारे में नहीं जानता मैं’
पृथ्वी ने भी ऐसा ही जवाब दिया
‘मैं तो ख़ुद एक टूटे हुए तारे की कड़ी हूँ
उल्काओं के बारे में तो जानती हूँ मैं
लेकिन बसंत से उनका रिश्ता मुझे पता नहीं’
एक गिरती हुई उल्का ने ही
तुम्हारे सवाल का जवाब दिया
‘ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है और ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र उसकी शाखाएँ हैं
हम जैसे छोटे सितारे उसके पत्‍ते हैं
पृथ्वी पर जब बसन्त आता है तो
हम देखने चले आते हैं
झड़े हुए पत्‍ते हमारे पिछले बरस के दोस्त हैं’ 

आओ हम दोनों मिलकर 
इस बसंत में आयी हुई उल्काओं का स्वागत करें

पतझर के बिखरे पत्तों पर चल आया मधुमास,
बहुत दूर से आया साजन दौड़ा-दौड़ा
थकी हुई छोटी-छोटी साँसों की कम्पित
पास चली आती हैं ध्वनियाँ
आती उड़कर गन्ध बोझ से थकती हुई सुवास

बन की रानी, हरियाली-सा भोला अन्तर
सरसों के फूलों-सी जिसकी खिली जवानी
पकी फसल-सा गरुआ गदराया जिसका तन
अपने प्रिय को आता देख लजायी जाती।
गरम गुलाबी शरमाहट-सा हल्का जाड़ा
स्निग्ध गेहुँए गालों पर कानों तक चढ़ती लाली जैसा
फैल रहा है।
हिलीं सुनहली सुघर बालियाँ!
उत्सुकता से सिहरा जाता बदन
कि इतने निकट प्राणधन
नवल कोंपलों से रस-गीले ओंठ खुले हैं
मधु-पराग की अधिकाई से कंठ रुँधा है
तड़प रही है वर्ष-वर्ष पर मिलने की अभिलाष।

उजड़ी डालों के अस्थिजाल से छनकर भू पर गिरी धूप
लहलही फुनगियों के छत्रों पर ठहर गई अब
ऐसा हरा-रुपहला जादू बनकर जैसे
नीड़ बसे पंछी को लगनेवाला टोना,
मधुरस उफना-उफनाकर आमों के बिरवों में बौराया
उमंग-उमंग उत्कट उत्कंठा मन की पिक-स्वर बनकर चहकी
अंगड़ाई सुषमा की बाहों ने सारा जग भेंट लिया
गउझर फूलों की झुकी बेल
मह-मह चम्पा के एक फूल से विपिन हुआ।

यह रंग उमंग उत्साह सृजनमयी प्रकृति-प्रिया का
चिकना ताज़ा सफल प्यार फल और फूल का
यह जीवन पर गर्व कि जिससे कलि इतरायी
जीवन का सुख भार कि जिससे अलि अलसाया।
तुहिन-बिन्दु-सजलानुराग यह रंग-विरंग सिन्दुर सुहाग
जन-पथ के तीर-तीर छिटके,
जन-जन के जीवन में ऐसे
मिल जाए जैसे नयी दुल्हन
से पहली बार सजन मिलते हैं
नव आशाओं का मानव को बासन्ती उपहार
मिले प्यार में सदा जीत हो, नहीं कभी हो हार।
जिनको प्यार नहीं मिल पाया
इन्हें फले मधुमास।
पतझर के बिखरे पत्तों पर चल आया मधुमास।

मैं कविता रचता हूं
रचता क्या हूं
प्रियतमाओं के मुखड़े निहारता हूं
और पत्थरों से सिर टकराता हूं ।
मैं कविता रचता हूं
फूलों का रस और रसों की सुगन्ध
इस तरह चुरा लेता हूं
जिस तरह किसी के आंख का काजल
कोई चुरा लेता है।
मैं रचता हूं कविता
और चुपचाप
गिन लेता हूं पंख
उड़ती चिड़िया के
कितने पर है उसकी उड़ान ।
मैं कविता रचता हूं
किशोरीलाल की झोपड़ी में बैठे
और रांधता हूं
बच्चों को खुश करने के लिए गारगोटियों की सब्जी ।
मैं रचता हूं कविता
तसलीमा नसरीन की
आंखों के आंसू
अपनी आंखों में महसूसते हुए
कि क्यों एक नारी को समूचा एशिया महाव्दिप
निष्कासित करने के लिए उतारू है।
मैं इसलिए कविता रचता हूं कि
बगावत की मेरी आवाज़
जड़हृदयों के भीतर तक चोट कर जाए
और कहीं से तो
एक चिंगारी उठे।
मैं कविता रचता हूं
क्योंकि आप भी समझ लें कि
कविता रचने के बिना
मैं रह नहीं सकता ।