Spring is in air, Fresh blossoms everywhere. 
Sending you my warm greetings on the 
auspicious occasion of Vasant Panchami!

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मैं कविता रचता हूं
रचता क्या हूं
प्रियतमाओं के मुखड़े निहारता हूं
और पत्थरों से सिर टकराता हूं ।
मैं कविता रचता हूं
फूलों का रस और रसों की सुगन्ध
इस तरह चुरा लेता हूं
जिस तरह किसी के आंख का काजल
कोई चुरा लेता है।
मैं रचता हूं कविता
और चुपचाप
गिन लेता हूं पंख
उड़ती चिड़िया के
कितने पर है उसकी उड़ान ।
मैं कविता रचता हूं
किशोरीलाल की झोपड़ी में बैठे
और रांधता हूं
बच्चों को खुश करने के लिए गारगोटियों की सब्जी ।
मैं रचता हूं कविता
तसलीमा नसरीन की
आंखों के आंसू
अपनी आंखों में महसूसते हुए
कि क्यों एक नारी को समूचा एशिया महाव्दिप
निष्कासित करने के लिए उतारू है।
मैं इसलिए कविता रचता हूं कि
बगावत की मेरी आवाज़
जड़हृदयों के भीतर तक चोट कर जाए
और कहीं से तो
एक चिंगारी उठे।
मैं कविता रचता हूं
क्योंकि आप भी समझ लें कि
कविता रचने के बिना
मैं रह नहीं सकता ।

जैसे बहन 'दा' कहती है

ऐसे किसी बँगले के किसी तरु( अशोक?) पर कोइ चिड़िया कुऊकी

चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराये पाँव तले

ऊँचे तरुवर से गिरे

बड़े-बड़े पियराये पत्ते

कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहायी हो-

खिली हुई हवा आयी फिरकी-सी आयी, चली गयी।

ऐसे, फ़ुटपाथ पर चलते-चलते-चलते

कल मैंने जाना कि बसन्त आया।


और यह कैलेण्डर से मालूम था

अमुक दिन वार मदनमहीने कि होवेगी पंचमी

दफ़्तर में छुट्टी थी- यह था प्रमाण

और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था

कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल

आम बौर आवेंगे

रंग-रस-गन्ध से लदे-फँदे दूर के विदेश के

वे नन्दनवन होंगे यशस्वी

मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व

अभ्यास करके दिखावेंगे

यही नहीं जाना था कि आज के नग्ण्य दिन जानूंगा

जैसे मैने जाना, कि बसन्त आया।

तीन बाई दो की उस पथरीली बेंच पर
तुमने बैठते ही पूछा था कि
बसन्त से पहले झड़े हुए पत्‍तों का
उल्काओं से क्या रिश्ता है
पसोपेश में पड़ गया था मैं यह सोचकर कि
उल्काएँ कौनसे बसंत के पहले गिरती हैं कि
पृथ्वी के अलावा सृष्टि में और कहाँ आता है बसन्त
चंद्रमा से पूछा मैंने तो उसने कहा 
‘मैं तो ख़ुद रोज़-रोज़ झड़ता हूँ
मेरे यहाँ हर दूसरे पखवाड़े बसन्त आता है
लेकिन उल्काओं के बारे में नहीं जानता मैं’
पृथ्वी ने भी ऐसा ही जवाब दिया
‘मैं तो ख़ुद एक टूटे हुए तारे की कड़ी हूँ
उल्काओं के बारे में तो जानती हूँ मैं
लेकिन बसंत से उनका रिश्ता मुझे पता नहीं’
एक गिरती हुई उल्का ने ही
तुम्हारे सवाल का जवाब दिया
‘ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है और ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र उसकी शाखाएँ हैं
हम जैसे छोटे सितारे उसके पत्‍ते हैं
पृथ्वी पर जब बसन्त आता है तो
हम देखने चले आते हैं
झड़े हुए पत्‍ते हमारे पिछले बरस के दोस्त हैं’ 

आओ हम दोनों मिलकर 
इस बसंत में आयी हुई उल्काओं का स्वागत करें