सहस शील हृदय में भर दे,
जीवन त्याग से भर दे,
संयम सत्य स्नेह का वर दे,
माँ सरस्वती आपके जीवन में उल्लास भर दे।
बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं।
हैप्पी बसंत पंचमी।

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हेमंत गइस जाड़ा भागिस, आइस सुख के दाता बसंत
जइसे सब-ला सुख देये बर आ जाथे कोन्हो साधु-संत ।

बड़ गुनकारी अब पवन चले, चिटको न जियानय जाड़ घाम
ये ऋतु-माँ सुख पाथयं अघात, मनखे अउ पशु-पंछी तमाम ।

जम्मो नदिया-नरवा मन के, पानी होगे निच्चट फरियर
अउ होगे सब रुख-राई के, डारा -पाना हरियर-हरियर ।

चंदा मामा बाँटयं चाँदी अउ सुरुज नरायन देय सोन
इनकर साहीं पर-उपकारी, तुम ही बताव अउ हवय कोन ?

बन,बाग,बगइचा लहलहायं, झूमय अमराई-फुलवारी
भांटा, भाजी, मुरई, मिरचा-मा, भरे हवय मरार-बारी ।

बड़ सुग्घर फूले लगिन फूल, महकत हें-मन-ला मोहत हें
मंदरस के माँछी रस ले के, छाता-मा अपन संजोवत हें ।

सरसों ओढिस पींयर चुनरी, झुमका-झमकाये हवयं चार
लपटे-पोटारे रुख मन-ला, ये लता-नार करथयं दुलार ।

मउरे-मउरे आमा रुख-मन , दीखयं अइसे दुलहा -डउका
कुलकय, फुदकय, नाचय, गावय, कोयली गीत ठउका-ठउका ।

बन के परसा मन बाँधे हें, बड़ सुग्घर केसरिया फेंटा
फेंटा- मा कलगी खोंचे हें, दीखत हें राजा के बेटा ।

मोती कस टपकयं महुआ मन, बनवासी बिनत-बटोरत हें
बेंदरा साहीं चढ़ के रुख-मा गेदराये तेंदू टोरत हें ।

मुनगा फरगे, बोइर झरगे, पाकिस अँवरा, झर गईस जाम
"फरई-झरई, बरई-बुतई" जग में ये होते रथे काम ।

लुवई-मिंजई सब्बो हो गे अउ धान धरागे कोठी-मा
बपुरा कमिया राजी रहिथयं, बासी- मा अउर लंगोटी-मा ।

अब कहूँ, चना, अरसी, मसूर के भर्री अड़बड़ चमकत हें
बड़ नीक चंदैनी रात लगय डहँकी बस्ती-मा झमकत हें ।

ढोलक बजायं, दादरा गायं, गायं ठेलहा-मा दाई-माई मन
ठट्ठा, गम्मत अउ काम-बुता, सब करयं ननद-भउजाई मन ।

कोन्हों मन खेत जायं अउ बटुरा-फली लायं भर के झोरा
अउ कोन्हों लायं गदेली गहूँ-चना भूँजे खातिर होरा ।

अब चेलिक-मोटियारिन मन के,खेले-खाए के दिन आइस
डंडा - फुगड़ी अउ रिलो-फाग , नाचे-गाये के दिन आइस ।

गुन, गुन, गुन, गुन करके भउंरा मन, गुन बसंत के गात हवयं 
अउ रटयं 'राम-धुन' सूवा मन, कठखोलवा ताल बजात हवयं ।

कवि मन के घलो कलम चलगे, बिन लोहा के नाँगर साहीं,
अउहा -तउहा लिख डारत हें, जे मन में भाय कुछू कांही ।

होले तिहार अब त हवय, हम एक रंग रंग जाबो जी,
"हम एक हवन, हम नेक हवन" दुनिया ला आज बताबो जी ।

एकर कतेक गुन गाई हम, ये ऋतु के महिमा हे अनंत
आथय सबके जिनगानी-मा, गर्मी, बरखा, जाड़ा, बसंत ।

जैसे बहन 'दा' कहती है

ऐसे किसी बँगले के किसी तरु( अशोक?) पर कोइ चिड़िया कुऊकी

चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराये पाँव तले

ऊँचे तरुवर से गिरे

बड़े-बड़े पियराये पत्ते

कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहायी हो-

खिली हुई हवा आयी फिरकी-सी आयी, चली गयी।

ऐसे, फ़ुटपाथ पर चलते-चलते-चलते

कल मैंने जाना कि बसन्त आया।


और यह कैलेण्डर से मालूम था

अमुक दिन वार मदनमहीने कि होवेगी पंचमी

दफ़्तर में छुट्टी थी- यह था प्रमाण

और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था

कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल

आम बौर आवेंगे

रंग-रस-गन्ध से लदे-फँदे दूर के विदेश के

वे नन्दनवन होंगे यशस्वी

मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व

अभ्यास करके दिखावेंगे

यही नहीं जाना था कि आज के नग्ण्य दिन जानूंगा

जैसे मैने जाना, कि बसन्त आया।

तीन बाई दो की उस पथरीली बेंच पर
तुमने बैठते ही पूछा था कि
बसन्त से पहले झड़े हुए पत्‍तों का
उल्काओं से क्या रिश्ता है
पसोपेश में पड़ गया था मैं यह सोचकर कि
उल्काएँ कौनसे बसंत के पहले गिरती हैं कि
पृथ्वी के अलावा सृष्टि में और कहाँ आता है बसन्त
चंद्रमा से पूछा मैंने तो उसने कहा 
‘मैं तो ख़ुद रोज़-रोज़ झड़ता हूँ
मेरे यहाँ हर दूसरे पखवाड़े बसन्त आता है
लेकिन उल्काओं के बारे में नहीं जानता मैं’
पृथ्वी ने भी ऐसा ही जवाब दिया
‘मैं तो ख़ुद एक टूटे हुए तारे की कड़ी हूँ
उल्काओं के बारे में तो जानती हूँ मैं
लेकिन बसंत से उनका रिश्ता मुझे पता नहीं’
एक गिरती हुई उल्का ने ही
तुम्हारे सवाल का जवाब दिया
‘ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है और ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र उसकी शाखाएँ हैं
हम जैसे छोटे सितारे उसके पत्‍ते हैं
पृथ्वी पर जब बसन्त आता है तो
हम देखने चले आते हैं
झड़े हुए पत्‍ते हमारे पिछले बरस के दोस्त हैं’ 

आओ हम दोनों मिलकर 
इस बसंत में आयी हुई उल्काओं का स्वागत करें

बसंत आएगा इस वीरान जंगल में जहाँ

वनस्पतियों को सिर उठाने के ज़ुर्म में

पूरा जंगल आग को सौंप दिया गया था

वसन्त आएगा दबे पाँव हमारे-तुम्हारे बीच

संवाद कायम करेगा उदास-उदास मौसम में

बिजली की तरह हँसी फेंक कर बसंत

सिखाएगा हमें अधिकार से जीना


पतझड़ का आख़िरी बैंजनी बदरंग पत्ता समय के बीच

फ़ालतू चीज़ों की तरह गिरने वाला है

बेआवाज़ एक ठोस शुरूआत

फूल की शक्ल में आकार लेने लगी है


मैंने देखा बंजर धाती पर लोग बढ़े आ रहे हैं

कंधे पर फावड़े और कुदाल लिए

देहाती गीत गुनगुनाते हुए

उनके सीने तने हुए हैं

बादल धीरे-धीरे उफ़क से ऊपर उठ रहे हैं

ख़ुश्गवार गंधाती हवा उनके बीच बह रही है


एक साथ मिलकर कई आवाज़ें जब बोलती हैं तो

सुननेवालों के कान के परदे हिलने लगते हैं

वे खिड़कियाँ खोलकर देखते हैं

दीवार में उगे हुए पेड़ की जड़ों से

पूरी इमारत दरक गई है

आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना!

धूप बिछाए फूल-बिछौना,
बगिय़ा पहने चांदी-सोना,
कलियां फेंके जादू-टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना!

बौराई अंबवा की डाली,
गदराई गेहूं की बाली,
सरसों खड़ी बजाए ताली,
झूम रहे जल-पात,
शयन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

खिड़की खोल चंद्रमा झांके,
चुनरी खींच सितारे टांके,
मन करूं तो शोर मचाके,
कोयलिया अनखात,
गहन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

नींदिया बैरिन सुधि बिसराई,
सेज निगोड़ी करे ढिठाई,
तान मारे सौत जुन्हाई,
रह-रह प्राण पिरात,
चुभन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

यह पीली चूनर, यह चादर,
यह सुंदर छवि, यह रस-गागर,
जनम-मरण की यह रज-कांवर,
सब भू की सौगा़त,
गगन की बात न करना!
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।