इस वसंत पंचमी मां सरस्वती आपको हर वो विद्या दे जो आपके पास नहीं है,

जो है उस पर चमक दे जिससे आपकी दुनिया चमक उठे।

वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की शुभकामनाएं!

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चादर-सी ओढ़ कर ये छायाएँ
तुम कहाँ चले यात्री, पथ तो है बाएँ।

धूल पड़ गई है पत्तों पर डालों लटकी किरणें
छोटे-छोटे पौधों को चर रहे बाग में हिरणें,
दोनों हाथ बुढ़ापे के थर-थर काँपे सब ओर
किन्तु आँसुओं का होता है कितना पागल ज़ोर-
बढ़ आते हैं, चढ़ आते हैं, गड़े हुए हों जैसे
उनसे बातें कर पाता हूँ कि मैं कुछ जैसे-तैसे।
पर्वत की घाटी के पीछे लुका-छिपी का खेल
खेल रही है वायु शीश पर सारी दनिया झेल।

छोटे-छोटे खरगोशों से उठा-उठा सिर बादल
किसको पल-पल झांक रहे हैं आसमान के पागल?
ये कि पवन पर, पवन कि इन पर, फेंक नज़र की डोरी
खींच रहे हैं किसका मन ये दोनों चोरी-चोरी?
फैल गया है पर्वत-शिखरों तक बसन्त मनमाना,
पत्ती, कली, फूल, डालों में दीख रहा मस्ताना।

कहीं क्या छूट गया ?
कहीं कुछ छूट गया ?
लम्बे अरसे से/तुम्हारा/किसी का भी
खत नही आया
खाली-खाली सा है रास्ता
डाकिया आता है
दस्तक देकर लौट जाता है
खत नही
लौटते हुए डाकिये की
पीठ भर दिख पाती है
उसके कन्धे पर लटके थैले में
कई सारे खत हैं
तरह-तरह की बातें है उनमें
उनकी तफसील बयान करना-नामुमकिन है
इतने सारे खत 
मगर मेरे लिये एक भी नही

दरवाजे की दस्तक से दौड़ कर आता हूं
दरवाजा खोलते-खोलते
एक लिफाफा देहरी पर छोड़ कर
चला जाता है, वह
सुनसान गली में
अपने दरवाजे पर खड़ा हूं मैं
हाथ में लिफाफा लिये
लिफाफे पर मेरा पता लिखा है
मगर उसके अन्दर कुछ भी नही है
लिफाफा खाली है
हाय राम ! अब क्या करूँ ?
पूरा का पूरा बसन्त गुजर गया
मेरे नाम -
मौसम का कोई संदेश ही नहीं आया
अनगिनत फूल खिले सृष्टि में
मैं कोई कविता ही नहीं लिख पाया।