मेरा आँगन
कितना कुशादा[1] कितना बड़ा था
जिसमें
मेरे सारे खेल
समा जाते थे
और आँगन के आगे था वह पेड़
कि जो मुझसे काफ़ी ऊँचा था
लेकिन
मुझको इसका यकीं था
जब मैं बड़ा हो जाऊँगा
इस पेड़ की फुनगी भी छू लूँगा
बरसों बाद
मैं घर लौटा हूँ
देख रहा हूँ
ये आँगन
कितना छोटा है
पेड़ मगर पहले से भी थोड़ा ऊँचा है

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ए माँ टेरेसा
मुझको तेरी अज़मत से इनकार नहीं है
जाने कितने सूखे लब और वीराँ आँखें 
जाने कितने थके बदन और ज़ख़्मी रूहें
कूड़ाघर में रोटी का इक टुकड़ा ढूँढते नंगे बच्चे
फ़ुटपाथों पर गलते सड़ते बुड्ढे कोढ़ी
जाने कितने बेघर बेदर बेकस इनसाँ
जाने कितने टूटे कुचले बेबस इनसाँ
तेरी छाँवों में जीने की हिम्मत पाते हैं
इनको अपने होने की जो सज़ा मिली है
उस होने की सज़ा से 
थोड़ी सी ही सही मोहलत पाते हैं
तेरा लम्स मसीहा है
और तेरा करम है एक समंदर
जिसका कोई पार नहीं है
ए माँ टेरेसा
मुझको तेरी अज़मत से इनकार नहीं है

मैं ठहरा ख़ुदगर्ज़
बस इक अपनी ही ख़ातिर जीनेवाला
मैं तुझसे किस मुँह से पूछूँ 
तूने कभी ये क्यूँ नहीं पूछा
किसने इन बदहालों को बदहाल किया है
तुने कभी ये क्यूँ नहीं सोचा
कौन-सी ताक़त 
इंसानों से जीने का हक़ छीन के
उनको फ़ुटपाथों और कूड़ाघरों तक पहुँचाती है
तूने कभी ये क्यूँ नहीं देखा
वही निज़ामे-ज़र
जिसने इन भूखों से रोटी छीनी है
तिरे कहने पर भूखों के आगे कुछ टुकड़े डाल रहा है
तूने कभी ये क्यूँ नहीं चाहा
नंगे बच्चे बुड्ढे कोढ़ी बेबस इनसाँ
इस दुनिया से अपने जीने का हक़ माँगें
जीने की ख़ैरात न माँगें
ऐसा क्यूँ है
इक जानिब मज़लूम से तुझको हमदर्दी है
दूसरी जानिब ज़ालिम से भी आर नहीं है
लेकिन सच है ऐसी बातें मैं तुझसे किस मुँह से पूछूँ 
पूछूँगा तो मुझ पर भी वो ज़िम्मेदारी आ जाएगी
जिससे मैं बचता आया हूँ

बेहतर है ख़ामोश रहूँ मैं
और अगर कुछ कहना हो तो
यही कहूँ मैं
ए माँ टेरेसा
मुझको तेरी अज़मत से इनकार नहीं है

शहर के दुकाँदारो, कारोबार-ए-उलफ़त में
सूद क्या ज़ियाँ क्या है, तुम न जान पाओगे
दिल के दाम कितने हैं, ख़्वाब कितने मँहगे हैं
और नक़द-ए-जाँ क्या है, तुम न जान पाओगे

कोई कैसे मिलता है, फूल कैसे खिलता है
आँख कैसे झुकती है, साँस कैसे रुकती है
कैसे रह निकलती है, कैसे बात चलती है
शौक़ की ज़बाँ क्या है तुम न जान पाओगे

वस्ल का सुकूँ क्या है, हिज्र का जुनूँ क्या है
हुस्न का फ़ुसूँ क्या है, इश्क़ के दुरूँ क्या है
तुम मरीज़-ए-दानाई, मस्लहत के शैदाई
राह ए गुमरहाँ क्या है, तुम न जान पाओगे

ज़ख़्म कैसे फलते हैं, दाग़ कैसे जलते हैं
दर्द कैसे होता है, कोई कैसे रोता है
अश्क क्या है नाले क्या, दश्त क्या है छाले क्या
आह क्या फ़ुग़ां क्या है, तुम न जान पाओगे

नामुराद दिल कैसे, सुबह-ओ-शाम करते हैं
कैसे जिंदा रहते हैं, और कैसे मरते हैं
तुमको कब नज़र आई, ग़मज़दों की तनहाई
ज़ीस्त बे-अमाँ क्या है, तुम न जान पाओगे

जानता हूँ मैं तुमको, ज़ौक़े-शाईरी भी है
शख़्सियत सजाने में, इक ये माहिरी भी है
फिर भी हर्फ़ चुनते हो, सिर्फ लफ़्ज़ सुनते हो
इनके दरम्याँ क्या हैं, तुम न जान पाओगे

आँख खुल मेरी गई हो गया मैं फिर ज़िन्दा
पेट के अन्धेरो से ज़हन के धुन्धलको तक 
एक साँप के जैसा रेंगता खयाल आया 
आज तीसरा दिन है 
आज तीसरा दिन है 

एक अजीब खामोशी से भरा हुआ कमरा कैसा खाली-खाली है 
मेज़ जगह पर रखी है कुर्सी जगह पर रखी है फर्श जगह पर रखी है 
अपनी जगह पर ये छत अपनी जगह दीवारे 
मुझसे बेताल्लुक सब, सब मेरे तमाशाई है 
सामने की खिड़्की से तीज़ धूप की किरने आ रही है बिस्तर पर 
चुभ रही है चेहरे में इस कदर नुकीली है 
जैसे रिश्तेदारो के तंज़ मेरी गुर्बत पर 
आँख खुल गई मेरी आज खोखला हूँ मै 
सिर्फ खोल बाकी है 
आज मेरे बिस्तर पर लेटा है मेरा ढाँचा 
अपनी मुर्दा आँखो से देखता है कमरे को एक सर्द सन्नाटा 
आज तीसरा दिन है 
आज तीसरा दिन है 

दोपहर की गर्मी में बेरादा कदमों से एक सड़क पर चलता हूँ 
तंग सी सड़क पर है दौनो सिम पर दुकाने 
खाली-खाली आँखो से हर दुकान का तख्ता 
सिर्फ देख सकता हूँ अब पढ़ नहीं जाता 
लोग आते-जाते है पास से गुज़रते है 
सब है जैसे बेचेहरा 
दूर की सदाए है आ रही है दूर 

 

ये वक़्त क्या है?
ये क्या है आख़िर
कि जो मुसलसल गुज़र रहा है 
ये जब न गुज़रा था, तब कहाँ था
कहीं तो होगा
गुज़र गया है तो अब कहाँ है
कहीं तो होगा
कहाँ से आया किधर गया है
ये कब से कब तक का सिलसिला है
ये वक़्त क्या है

ये वाक़ये 
हादसे 
तसादुम
हर एक ग़म और हर इक मसर्रत
हर इक अज़ीयत हरेक लज़्ज़त
हर इक तबस्सुम हर एक आँसू 
हरेक नग़मा हरेक ख़ुशबू 
वो ज़ख़्म का दर्द हो 
कि वो लम्स का हो ज़ादू 
ख़ुद अपनी आवाज हो 
कि माहौल की सदाएँ
ये ज़हन में बनती
और बिगड़ती हुई फ़िज़ाएँ
वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले  हों 
कि दिल की हलचल
तमाम एहसास सारे जज़्बे
ये जैसे पत्ते हैं
बहते पानी की सतह पर जैसे तैरते हैं
अभी यहाँ हैं अभी वहाँ है
और अब हैं ओझल
दिखाई देता नहीं है लेकिन
ये कुछ तो है जो बह रहा है
ये कैसा दरिया है
किन पहाड़ों से आ रहा है
ये किस समन्दर को जा रहा है
ये वक़्त क्या है

कभी-कभी मैं ये सोचता हूँ
कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो
तो ऐसा लगता है दूसरी सम्त जा रहे हैं 
मगर हक़ीक़त में पेड़ अपनी जगह खड़े हैं
तो क्या ये मुमकिन है
सारी सदियाँ क़तार अंदर क़तार 
अपनी जगह खड़ी हों
ये वक़्त साकित  हो और हम हीं गुज़र रहे हों 
इस एक लम्हें में सारे लम्हें
तमाम सदियाँ छुपी हुई हों
न कोई आइन्दा  न गुज़िश्ता 
जो हो चुका है वो हो रहा है
जो होने वाला है हो रहा है
मैं सोचता हूँ कि क्या ये मुमकिन है
सच ये हो कि सफ़र में हम हैं
गुज़रते हम हैं
जिसे समझते हैं हम गुज़रता है
वो थमा है
गुज़रता है या थमा हुआ है
इकाई है या बंटा हुआ है
है मुंज़मिद या पिघल रहा है 
किसे ख़बर है किसे पता है
ये वक़्त क्या है

ये आए दिन के हंगामे 
ये जब देखो सफ़र करना 
यहाँ जाना वहाँ जाना 
इसे मिलना उसे मिलना 
हमारे सारे लम्हे 
ऐसे लगते हैं 
कि जैसे ट्रेन के चलने से पहले 
रेलवे-स्टेशन पर 
जल्दी जल्दी अपने डब्बे ढूँडते 
कोई मुसाफ़िर हों 
जिन्हें कब साँस भी लेने की मोहलत है 
कभी लगता है 
तुम को मुझ से मुझ को तुम से मिलने का 
ख़याल आए 
कहाँ इतनी भी फ़ुर्सत है 
मगर जब संग-दिल दुनिया मेरा दिल तोड़ती है तो 
कोई उम्मीद चलते चलते 
जब मुँह मोड़ती है तो 
कभी कोई ख़ुशी का फूल 
जब इस दिल में खिलता है 
कभी जब मुझ को अपने ज़ेहन से 
कोई ख़याल इनआम मिलता है 
कभी जब इक तमन्ना पूरी होने से 
ये दिल ख़ाली सा होता है 
कभी जब दर्द आ के पलकों पे मोती पिरोता है 
तो ये एहसास होता है 
ख़ुशी हो ग़म हो हैरत हो 
कोई जज़्बा हो 
इस में जब कहीं इक मोड़ आए तो 
वहाँ पल भर को 
सारी दुनिया पीछे छूट जाती है 
वहाँ पल भर को 
इस कठ-पुतली जैसी ज़िंदगी की 
डोरी टूट जाती है 
मुझे उस मोड़ पर 
बस इक तुम्हारी ही ज़रूरत है 
मगर ये ज़िंदगी की ख़ूबसूरत इक हक़ीक़त है 
कि मेरी राह में जब ऐसा कोई मोड़ आया है 
तो हर उस मोड़ पर मैं ने 
तुम्हें हम-राह पाया है

अपनी बेटी ज़ोया के नाम
 
ये जीवन इक राह नहीं
इक दोराहा है

पहला रस्ता बहुत सरल है
इसमें कोई मोड़ नहीं है
ये रस्ता इस दुनिया से बेजोड़ नहीं है
इस रस्ते पर मिलते हैं रिश्तों के बंधन
इस रस्ते पर चलनेवाले 
कहने को सब सुख पाते हैं
लेकिन
टुकड़े टुकड़े होकर 
सब रिश्तों में बँट जाते हैं
अपने पल्ले कुछ नहीं बचता
बचती है बेनाम सी उलझन
बचता है साँसों का ईंधन
जिसमें उनकी अपनी हर पहचान
और उनके सारे सपने
जल बुझते हैं
इस रस्ते पर चलनेवाले
ख़ुद को खोकर जग पाते हैं
ऊपर-ऊपर तो जीते हैं
अंदर-अंदर मर जाते हैं
 
दूसरा रस्ता बहुत कठिन है
इस रस्ते में कोई किसी के साथ नहीं है
कोई सहारा देनेवाला हाथ नहीं है
इस रस्ते में धूप है 
कोई छाँव नहीं है
जहाँ तस्सली भीख में देदे कोई किसी को
इस रस्ते में ऐसा कोई गाँव नहीं है
ये उन लोगों का रस्ता है
जो ख़ुद अपने तक जाते हैं
अपने आपको जो पाते हैं
तुम इस रस्ते पर ही चलना
 
मुझे पता है 
ये रस्ता आसान नहीं है
लेकिन मुझको ये ग़म भी है
तुमको अब तक 
क्यूँ अपनी पहचान नहीं है