कभी पाबन्दियों से छुट के भी दम घुटने लगता है
दरो-दीवार हो जिनमें वही ज़िन्दाँ नहीं होता

हमारा ये तजुर्बा है कि ख़ुश होना मोहब्बत में
कभी मुश्किल नहीं होता, कभी आसाँ नहीं होता

बज़ा है ज़ब्त भी लेकिन मोहब्बत में कभी रो ले
दबाने के लिये हर दर्द ऐ नादाँ ! नहीं होता

यकीं लायें तो क्या लायें, जो शक लायें तो क्या लायें
कि बातों से तेरी सच झूठ का इम्काँ नहीं होता

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हिंज़ाबों में भी तू नुमायूँ नुमायूँ
फरोज़ाँ फरोज़ाँ दरख्शाँ दरख्शाँ

 

तेरे जुल्फ-ओ-रुख़ का बादल ढूंढता हूँ
शबिस्ताँ शबिस्ताँ चाराघाँ चाराघाँ

 

ख़त-ओ-ख़याल की तेरे परछाइयाँ हैं
खयाबाँ खयाबाँ गुलिस्ताँ गुलिस्ताँ

 

जुनूँ-ए-मुहब्बत उन आँखों की वहशत
बयाबाँ बयाबाँ गज़लाँ गज़लाँ

 

लपट मुश्क-ए-गेसू की तातार तातार
दमक ला'ल-ए-लब की बदक्शाँ बदक्शाँ

 

वही एक तबस्सुम चमन दर चमन है
वही पंखूरी है गुलिस्ताँ गुलिस्ताँ

 

सरासार है तस्वीर जमीतों की
मुहब्बत की दुनिया हरासाँ हरासाँ

 

यही ज़ज्बात-ए-पिन्हाँ की है दाद काफी
चले आओ मुझ तक गुरेजाँ गुरेजाँ

 

"फिराक" खाज़ीं से तो वाकिफ थे तुम भी
वो कुछ खोया खोया परीशाँ परीशाँ

उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगी 
इक नागन-सी लहराने लगी 

जब ज़ि‍क्र तेरा महफ़ि‍ल में छिड़ा क्यों आँख तेरी शरमाने लगी 
क्या़ मौजे-सबा थी मेरी नज़र क्यों ज़ुल्फ़ तेरी बल खाने लगी 
महफ़ि‍ल में तेरी एक-एक अदा कुछ साग़र-सी छलकाने लगी 
या रब यॉ चल गयी कैसी हवा क्यों दिल की कली मुरझाने लगी 
शामे-वादा कुछ रात गये तारों को तेरी याद आने लगी 
साज़ों ने आँखे झपकायीं नग़्मों को मेरे नींद आने लगी 
जब राहे-ज़ि‍न्दगी काट चुके हर मंज़ि‍ल की याद आने लगी 
क्या उन जु़ल्फ़ों को देख लिया क्यों मौजे-सबा थर्राने लगी 
तारे टूटे या आँख कोई अश्कों से गुहर1 बरसाने लगी 
तहज़ीब उड़ी है धुआँ बन कर सदियों की सई2 ठिकाने लगी 
कूचा-कूचा रफ़्ता-रफ़्ता वो चाल क़यामत ढाने लगी 
क्या बात हुई ये आँख तेरी क्यों लाखों कसमें खाने लगी 
अब मेरी निगाहे-शौक़ तेरे रूख़सारों के फूल खिलाने लगी 
फि‍र रात गये बज़्मे-अंजुम रूदाद3 तेरी दोहराने लगी
फि‍र याद तेरी हर सीने के गुलज़ारों को महकाने लगी 
बेगोरो-कफ़न जंगल में ये लाश दीवाने की ख़ाक उड़ाने लगी 
वो सुब्ह‍ की देवी ज़ेरे शफ़क़ घूँघट-सी ज़रा सरकाने लगी 

उस वक्त फ़ि‍राक हुई यॅ ग़ज़ल 
जब तारों को नींद आने लगी


1- मोती, 2- प्रयत्न, 3- कहानी

ज़िन्दगी क्या है,ये मुझसे पूछते हो दोस्तों.
एक पैमाँ१ है जो पूरा होके भी न पूरा हो.

बेबसी ये है कि सब कुछ कर गुजरना इश्क़ में.
सोचना दिल में ये,हमने क्या किया फिर बाद को.

रश्क़ जिस पर है ज़माने भर को वो भी तो इश्क़.
कोसते हैं जिसको वो भी इश्क़ ही है,हो न हो.

आदमियत का तक़ाज़ा था मेरा इज़हारे-इश्क़.
भूल भी होती है इक इंसान से,जाने भी दो.

मैं तुम्हीं में से था कर लेते हैं यादे-रफ्तगां२.
यूँ किसी को भूलते हैं दोस्तों,ऐ दोस्तों !

यूँ भी देते हैं निशान इस मंज़िले-दुश्वार का.
जब चला जाए न राहे-इश्क़ में तो गिर पड़ो.

मैकशों ने आज तो सब रंगरलियाँ देख लीं.
शैख३ कुछ इन मुँहफटों को दे-दिलाक चुप करो.

आदमी का आदमी होना नहीं आसाँ 'फ़िराक़'.
इल्मो-फ़न४,इख्लाक़ो-मज़हब५ जिससे चाहे पूछ लो.

१. प्रतिज्ञा २. पुरानी यादें ३. धर्मोपदेशक ४. ज्ञान और कला ५. सदाचार और धर्म

सर में सौदा भी नहीं, दिल में तमन्ना भी नहीं
लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं

यूँ तो हंगामा उठाते नहीं दीवाना-ए-इश्क
मगर ऐ दोस्त, कुछ ऐसों का ठिकाना भी नहीं

मुद्दतें गुजरी, तेरी याद भी आई ना हमें
और हम भूल गये हों तुझे, ऐसा भी नहीं

ये भी सच है कि मोहब्बत में नहीं मैं मजबूर
ये भी सच है कि तेरा हुस्न कुछ ऐसा भी नहीं

दिल की गिनती ना यागानों में, ना बेगानों में
लेकिन इस ज़लवागाह-ए-नाज़ से उठता भी नहीं

बदगुमाँ हो के मिल ऐ दोस्त, जो मिलना है तुझे
ये झिझकते हुऐ मिलना कोई मिलना भी नहीं

शिकवा-ए-शौक करे क्या कोई उस शोख़ से जो
साफ़ कायल भी नहीं, साफ़ मुकरता भी नहीं

मेहरबानी को मोहब्बत नहीं कहते ऐ दोस्त
आह, मुझसे तो मेरी रंजिश-ए-बेजां भी नहीं

बात ये है कि सूकून-ए-दिल-ए-वहशी का मकाम
कुंज़-ए-ज़िन्दान भी नहीं, वुसत-ए-सहरा भी नहीं

मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते, कि "फ़िराक"
है तेरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं

नया घाव है प्रेम का जो चमके दिन-रात
होनहार बिरवान के चिकने-चिकने पात.

यही जगत की रीत है, यही जगत की नीत
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत.

जो न मिटे ऐसा नहीं कोई भी संजोग
होता आया है सदा मिलन के बाद वियोग.

जग के आँसू बन गए निज नयनों के नीर
अब तो अपनी पीर भी जैसे पराई पीर.

कहाँ कमर सीधी करे, कहाँ ठिकाना पाय
तेरा घर जो छोड़ दे, दर-दर ठोकर खाय.

जगत-धुदलके में वही चित्रकार कहलाय
कोहरे को जो काट कर अनुपम चित्र बनाय.

बन के पंछी जिस तरह भूल जाय निज नीड़
हम बालक सम खो गए, थी वो जीवन-भीड़.

याद तेरी एकान्त में यूँ छूती है विचार
जैसे लहर समीर की छुए गात सुकुमार.

मैंने छेड़ा था कहीं दुखते दिल का साज़
गूँज रही है आज तक दर्द भरी आवाज़.


दूर तीरथों में बसे, वो है कैसा राम
मन-मन्दिर की यात्रा,मूरख चारों धाम.

वेद,पुराण और शास्त्रों को मिली न उसकी थाह
मुझसे जो कुछ कह गई , इक बच्चे की निगाह.

 १.शाम

ये शाम इक आईना-ए-नीलगूं,ये नम,ये महक
ये मंजरों की झलक, खेत, बैग, दरिया, गांव 
वो कुछ सुलगते हुए,कुछ सुलगने वाले अलाव
सियाहियों का दबे पाँव आसमां से नजूल
लटों को खोल दे जिस तरह शाम की देवी
पुराने वक्त के बरगद की ये उदास लटायें
करीब- ओ- दूर ये गोधूलि की उभरती घटायें
ये कायनात का ठहराव, ये अथाह सुकूत 
ये नीम-तीरा फ़ज़ा रोज़े गर्म का ताबूत 
धुआँ-धुआँ सी ज़मीं है घुला-घुला सा फ़लक

       २.रात का पहला पहर
 
ये चाँदनी,ये हवाएँ,ये शाखे-गुल की लचक 
ये दौरे-बादा,ये सजे-ख़मोश फितरत के
सुनाई देने लगी जगमगाते सीनों में 
दिलों के नाज़ुक-ओ-शफ्फाफ़ आबगीनों में 
तेरे ख्याल की पड़ती हुई किरन की खनक

        ३. रात गये

ये रात!छनती हवाओं की सोंधी-सोंधी महक 
ये खेल करती हुई चाँदनी की नरम दमक 
सुगंध 'रात की रानी' की जब मचलती है 
फ़ज़ा में रहे-तर करवटें बदलती है 

ये रूप सर से कदम तक हसीन जैसे गुनाह 
ये आरिजों की दमक,ये फुसुने-चश्मे-सियाह 
ये धज न दे जो अजंता की सनअतों को पनाह 
ये सीना,पड़ ही गई देवलोक की भी निगाह 

ये सरज़मीन है आकाश की परस्तिश-गाह
उतारते हैं तेरी आरती सितारा-ओ-माह
सिजल बदन की बयाँ किस तरह हो कैफियत 
सरस्वती के बजाए हुए सितार की गत 

जमाले-यार तेरे गुलिस्ताँ की रह-रह के 
जबीने-नाज़ तेरी कहकशाँ की रह-रह के 
दिलों में आईना-दर-आईना सुहानी झलक 

       ४.आधी रात से कुछ पहले 

ये छब,ये रूप,ये जीवन,ये सज,ये धज,ये लहक 
चमकते तारों की किरनों की नर्म-नर्म फुआर 
ये रसमसाते बदन का उठान और ये उभार 
फज़ा के आईने में जैसे लहलहाये बहार 
ये बेकरार,ये बेइख़्तियार जोशे-नमूद
कि जैसे नूर का फव्वारा हो शफ़क-आलूद 
ये जलवे पैकरे-शब ताब के ये बज्मे-शहूद 
ये मस्तियाँ कि मए-साफ़-ओ-दुर्द सब बेबूद
खिजल हो ला'ले-यमन उज़्व-उज़्व की वो डलक

जो दिलो-जिगर में उतर गई वो निगाहे-यार कहाँ है अब ?
कोई हद है ज़ख्मे-निहाँ की भी कि हयात वहमो गुमाँ है अब 

मिली इश्क़ को वो हयाते नौ कि आदम का जिसमें सुकून है 
ये हैं दर्द की नई मंज़िलें न ख़लिश न सोज़े-निहाँ है अब 

कभी थीं वो उठती जवानियाँ कि गुबारे-राह नुजूम थे 
न बुलंदियाँ वो नज़र में हैं न वो दिल की बर्के-तपाँ है अब 

जिन्हें ज़िन्दगी का मज़ाक था, वही मौत को भी समझ सके 
न उमीदो-बीम के मरहले में ख्याले-सूदो-ज़ियाँ है अब 

न वो हुस्नो इश्क़ की सोहबत न वो मजरे न वो सानिहे 
न वो बेकसों का सुकूते-ग़म न किसी को तेग़े-ज़बाँ है अब 

ये फ़िराक़ है कि विसाल है कि ये महवियत का कमाल है 
वो ख्याले-यार कहाँ है अब वो जमले-यार कहाँ है अब 

मुझे मिट के भी तो सुकूँ नहीं कि ये हालतें भी बदल चलीं 
जिसे मौत समझे थे इश्क़ में, वो मिसाले-उम्रे-रवाँ है अब ?

वो निगाह उठ के पलट गयी, वो शरारे उड़ के निहाँ हुए 
जिसे दिल समझते थे आज तक वो 'फ़िराक़' उठता धुआँ है अब

हर जलवे से एक दरस-ए-नुमू लेता हूँ
लबरेज़ कई जाम-ओ-सुबू लेता
पड़ती है जब आँख तुझपे ऐ जान-ए-बहार
संगीत की सरहदों को छू लेता हूँ

 

हर साज़ से होती नहीं एक धुन पैदा
होता है बड़े जतन से ये गुन पैदा
मीज़ाँ-ए-नशात-ओ-गम में सदियों तुल कर
होता है हालात में तव्जौ पैदा

 

सेहरा में जमाँ मकाँ के खो जाती हैं
सदियों बेदार रह के सो जाती हैं
अक्सर सोचा किया हुँ खल-वत में फिराक
तहजीबें क्युं गुरूब हो जाती हैं

 

एक हलका-ए-ज़ंजीर तो ज़ंजीर नहीं
एक नुक्ता-ए-तस्वीर तो तस्वीर नहीं
तकदीर तो कौमों की हुआ करती है
एक शख्स की तकदीर कोई तकदीर नहीं

 

महताब में सुर्ख अनार जैसे छूटे
से कज़ा लचक के जैसे छूटे
वो कद है के भैरवी जब सुनाये सुर
गुन्चों से भी नर्म गुन्चगी देखी है

 

नाजुक कम कम शगुफ्तगी देखी है
हाँ, याद हैं तेरे लब-ए-आसूदा मुझे
तस्वीर-ए-सुकूँ-ए-जिन्दगी देखी है

 

जुल्फ-ए-पुरखम इनाम-ए-शब मोड़ती है
आवाज़ तिलिस्म-ए-तीरगी तोड़ती है
यूँ जलवों से तेरे जगमगाती है जमीं
नागिन जिस तरह केंचुली छोड़ती है

नई हुई फिर रस्म पुरानी दीवाली के दीप जले
शाम सुहानी रात सुहानी दीवाली के दीप जले

धरती का रस डोल रहा है दूर-दूर तक खेतों के
लहराये वो आंचल धानी दीवाली के दीप जले

नर्म लबों ने ज़बानें खोलीं फिर दुनिया से कहन को
बेवतनों की राम कहानी दीवाली के दीप जले

लाखों-लाखों दीपशिखाएं देती हैं चुपचाप आवाज़ें
लाख फ़साने एक कहानी दीवाली के दीप जले

निर्धन घरवालियां करेंगी आज लक्ष्मी की पूजा
यह उत्सव बेवा की कहानी दीवाली के दीप जले

लाखों आंसू में डूबा हुआ खुशहाली का त्योहार
कहता है दुःखभरी कहानी दीवाली के दीप जले

कितनी मंहगी हैं सब चीज़ें कितने सस्ते हैं आंसू
उफ़ ये गरानी ये अरजानी दीवाली के दीप जले

मेरे अंधेरे सूने दिल का ऐसे में कुछ हाल न पूछो
आज सखी दुनिया दीवानी दीवाली के दीप जले

तुझे खबर है आज रात को नूर की लरज़ा मौजों में
चोट उभर आई है पुरानी दीवाली के दीप जले

जलते चराग़ों में सज उठती भूके-नंगे भारत की
ये दुनिया जानी-पहचानी दीवाली के दीप जले

भारत की किस्मत सोती है झिलमिल-झिलमिल आंसुओं की
नील गगन ने चादर तानी दीवाली के दीप जले

देख रही हूं सीने में मैं दाग़े जिगर के चिराग लिये
रात की इस गंगा की रवानी दीवाली के दीप जले

जलते दीप रात के दिल में घाव लगाते जाते हैं
शब का चेहरा है नूरानी दीवाले के दीप जले

जुग-जुग से इस दुःखी देश में बन जाता है हर त्योहार
रंजोख़ुशी की खींचा-तानी दीवाली के दीप जले

रात गये जब इक-इक करके जलते दीये दम तोड़ेंगे
चमकेगी तेरे ग़म की निशानी दीवाली के दीप जले

जलते दीयों ने मचा रखा है आज की रात ऐसा अंधेर
चमक उठी दिल की वीरानी दीवाली के दीप जले

कितनी उमंगों का सीने में वक़्त ने पत्ता काट दिया
हाय ज़माने हाय जवानी दीवाली के दीप जले

लाखों चराग़ों से सुनकर भी आह ये रात अमावस की
तूने पराई पीर न जानी दीवाली के दीप जले

लाखों नयन-दीप जलते हैं तेरे मनाने को इस रात
ऐ किस्मत की रूठी रानी दीवाली के दीफ जले

ख़ुशहाली है शर्ते ज़िंदगी फिर क्यों दुनिया कहती है
धन-दौलत है आनी-जानी दीवाली के दीप जले

बरस-बरस के दिन भी कोई अशुभ बात करता है सखी
आंखों ने मेरी एक न मानी दीवाली के दीप जले

छेड़ के साज़े निशाते चिराग़ां आज फ़िराक़ सुनाता है
ग़म की कथा ख़ुशी की ज़बानी दीवाली के दीप जले

ये निकहतों कि नर्म रवी, ये हवा, ये रात
याद आ रहे हैं इश्क़ के टूटे तआ ल्लुक़ात

मासूमियों की गोद में दम तोड़्ता है इश्क़्
अब भी कोई बना ले तो बिगड़ी नहीं है बात

इक उम्र कट गई है तेरे इन्तज़ार में
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिनसे एक रात

हम अहले-इन्तज़ार के आहट पे कान थे
ठण्डी हवा थी, ग़म था तेरा, ढल चली थी रात

हर साई-ओ-हर अमल में मोहब्बत का हाथ है
तामीर-ए-ज़िन्दगी के समझ कुछ मुहरकात

अहल-ए-रज़ा में शान-ए-बग़ावत भी हो ज़रा
इतनी भी ज़िन्दगी न हो पाबंद-ए-रस्मियात

उठ बंदगी से मालिक-ए-तकदीर बन के देख
क्या वसवसा अजब का क्या काविश-ए-निज़ात

मुझको तो ग़म ने फ़ुर्सत-ए-ग़म भी न दी फ़िराक
दे फ़ुर्सत-ए-हयात न जैसे ग़म-ए-हयात

अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूँ ही कभी लब खोले हैं
पहले "फ़िराक़" को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं


दिन में हम को देखने वालो अपने-अपने हैं औक़ाब
जाओ न तुम इन ख़ुश्क आँखों पर हम रातों को रो ले हैं


फ़ितरत मेरी इश्क़-ओ-मोहब्बत क़िस्मत मेरी तन्हाई
कहने की नौबत ही न आई हम भी कसू के हो ले हैं


बाग़ में वो ख़्वाब-आवर आलम मौज-ए-सबा के इशारों पर
डाली डाली नौरस पत्ते सहस सहज जब डोले हैं


उफ़ वो लबों पर मौज-ए-तबस्सुम जैसे करवटें लें कौंदें
हाय वो आलम जुम्बिश-ए-मिज़गाँ जब फ़ितने पर तोले हैं


इन रातों को हरीम-ए-नाज़ का इक आलम होये है नदीम
ख़ल्वत में वो नर्म उँगलियाँ बंद-ए-क़बा जब खोले हैं


ग़म का फ़साना सुनने वालो आख़िर्-ए-शब आराम करो
कल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं


हम लोग अब तो पराये-से हैं कुछ तो बताओ हाल-ए-"फ़िराक़"
अब तो तुम्हीं को प्यार करे हैं अब तो तुम्हीं से बोले हैं

कभी जब तेरी याद आ जाय है दिलों पर घटा बन के छा जाय है 
शबे-यास में कौन छुप कर नदीम1 मेरे हाल पर मुसकुरा जाय है 
महब्बत में ऐ मौत ऐ ‍‍ज़ि‍न्दगी मरा जाय है या जिया जाय है 
पलक पर पसे-तर्के-ग़म2 गाहगाह सितारा कोई झिलमिला जाय है 
तेरी याद शबहा-ए-बे-ख्‍़वाब में सितारों की दुनिया बस जाय है 
जो बे-ख्‍़वाब रक्खे है ता ज़ि‍न्दगी वही ग़म किसी दिन सुला जाय है 
न सुन मुझसे हमदम मेरा हाल-ज़ार दिलो-नातवाँ सनसना जाय है 
ग़ज़ल मेरी खींचे है ग़म की शराब पिये है वो जिससे पिया जाय है 
मेरी शाइरी जो है जाने-नशात ग़मों के ख़ज़ाने लुटा जाय है 
मुझे छोड़ कर जाय है तेरी याद कि जीने का एक आसरा जाय है 
मुझे गुमरही का नहीं कोई ख़ौफ़ तेरे घर को हर रास्ता जाय है 

सुनायें तुम्हें दास्ताने-‍फ़ि‍राक 
मगर कब किसी से सुना जाय है

1- साथी, 2- दुख के आँसू

सियाह पेड़ हैं अब आप अपनी परछाईं
जमीं से ता महो-अंजुम सुकूत के मीनार
जिधर निगाह करे इक अथाह गुमशुदगी
एक-एक करके अफ़सुर्दा चिरागों की पलकें
झपक गई-जो खुली हैं झपकने वाली हैं
झपक रहा है 'पुरा'चाँदनी के दर्पन में 
रसीले कैफ़ भरे मंज़रों का जगता ख़्वाब
फ़लक पे तारों को पहली जमाहियाँ आई 

        २.
त्मोलियों की दुकानें कहीं-खनी हैं खुली
कुछ ऊँघती हुई बढ़ती हैं शाहराहों पर 
सवारियों के बड़े घुँघरुओं की झंकारें 
खड़ा है ओस में चुपचाप हरसिंगार का पेड़ 
दुल्हन हो जैसे हया की सुगंध से बोझल 
ये मौजे-नूर,ये भरपूर ये खिली हुई रात 
कि जैसे खिलता चला जाए इक सफ़ेद कँवल
             सिपाहे-रूस हैं अब कितनी दूर बर्लिन से ?
--जगा रहा है कोई आधी रात का जादू-
छलक रही है खुमे-गैब से शराबे-वुजूद
फ़जा-ए-नीमशबी नर्गिशे-खुमार-आलूद 
कँवल की चुटकियों में बंद है नदी का सुहाग

           ३.
ये रस की सेज,ये सुकुमार,ये कोमल गात 
नैन कमल की झपक,कामरूप का जादू 
ये रसमलाई पलक की घनी-घनी परछाईं
फ़लक पे बिखरे हुए चाँद और सितारों की
चमकती उँगलियों से छिड़के राज फितरत के 
तराने जागने वाले हैं, तुम भी जाग उट्ठो

           ४.
शुआए-मेहर ने उनको चूम-चूम लिया 
नदी के बीच कुमुदनी के फूल खिल उट्ठे
न मुफलिसी हो,तो कितनी हसीन है दुनिया 
ये झाँय-झाँय-सी रह-रह के एक झींगुर की
हिना कि टट्टियों में नरम सरसराहट-सी
फज़ा के सीने में ख़ामोश सनसनाहट-सी
लटों में रात की देवी की थरथराहट-सी
            ये कायनात अब नींद ले चुकी होगी!

           ५.
ये मह्वे-ख़्वाब हैं रंगीन मछलियाँ तहे-आब
कि हौज़े-सहन में अब इनकी चश्मकें भी नहीं 
ये सरनिगूँ हैं सरे-शाख फूल 'गुड़हल' के
कि जैसे बेबुझे अंगारे ठंढे पड़ जायें 
ये चाँदनी है कि उमड़ा हुआ है रस-सागर
इक आदमी है कि इतना दुखी है दुनिया में

तेरे आने की महफ़िल ने जो कुछ आहट-सी पाई है,
               हर इक ने साफ़ देखा शमअ की लौ थरथराई है.
तपाक और मुस्कराहट में भी आँसू थरथराते हैं,
               निशाते-दीद१ भी चमका हुआ दर्दे-जुदाई है.
बहुत चंचल है अरबाबे-हवस२ की उँगलियाँ लेकिन,
               उरूसे-ज़िन्दगी३ की भी नक़ाबे-रूख४ उठाई है.
ये मौजों के थपेड़े,ये उभरना बहरे-हस्ती५ में,
               हुबाबे-ज़िन्दगी६ ये क्या हवा सर में समाई है?
सुकूते-बहरे-बर७ की खलवतों८ में खो गया हूँ जब,
               उन्हीं मौकों पे कानों में तेरी आवाज़ आई है.
बहुत-कुछ यूँ तो था दिल में,मगर लब सी लिए मैंने,
               अगर सुन लो तो आज इक बात मेरे दिल में आई है.
मोहब्बत दुश्मनी में क़ायम है रश्क९ का जज्बा,
               अजब रुसवाइयाँ हैं ये अजब ये जग-हँसाई है.
मुझे बीमो-रज़ा१० की बहसे-लाहासिल११ में उलझाकर,
               हयाते-बेकराँ१२ दर-पर्दा क्या-क्या मुस्कराई है.
हमीं ने मौत को आँखों में आँखे डालकर देखा,
               ये बेबाकी नज़र की ये मोहब्बत की ढिठाई है.
मेरे अशआर१३ के मफहूम१४ भी हैं पूछते मुझसे 
               बताता हूँ तो कह देते हैं ये तो खुद-सताई१५ है.
हमारा झूठ इक चूमकार है बेदर्द दुनिया को,
               हमारे झूठ से बदतर जमाने की सचाई है.


१. देखने की खुशी २. लालच ३. जीवन रूपी दुल्हन ४. घूँघट ५. जीवन-सागर 
६. जीवन रूपी बुलबुला ७. धरती का मौन ८. एकांत ९. ईर्ष्या १०. भय और ईश्वरेच्छा
११. व्यर्थ की बहस १२. अथाह जीवन १३.शे'र १४.अर्थ १५.खुद की प्रशंसा

यूँ माना ज़ि‍न्दगी है चार दिन की 
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी

ख़ुदा को पा गया वायज़ मगर है 
ज़रूरत आदमी को आदमी की 

बसा-औक्रात1 दिल से कह गयी है 
बहुत कुछ वो निगाहे-मुख़्तसर भी 

मिला हूँ मुस्कुरा कर उससे हर बार 
मगर आँखों में भी थी कुछ नमी-सी 

महब्बत में करें क्या हाल दिल का 
ख़ुशी ही काम आती है न ग़म की 

भरी महफ़ि‍ल में हर इक से बचा कर 
तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली 

लड़कपन की अदा है जानलेवा 
गज़ब ये छोकरी है हाथ-भर की

है कितनी शोख़, तेज़ अय्यामे-गुल2 पर 
चमन में मुस्कुहराहट कर कली की 

रक़ीबे-ग़मज़दा3 अब सब्र कर ले 
कभी इससे मेरी भी दोस्ती थी 

1- कभी-कभी, 2- बहार के दिन, 3- दुखी प्रतिद्वन्द्वी