चन्द रोज़ और मिरी जान फ़कत चन्द ही रोज़
ज़ुल्म की छांव में दम लेने पे मज़बूर हैं हम
और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें
अपने अजदाद की मीरास हैं माज़ूर हैं हम
जिस्म पर कैद है, जज़बात पे ज़ंजीरें हैं
फ़िक्र महबूस है, गुफ़तार पे ताज़ीरें हैं
अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जीये जाते हैं
ज़िन्दगी क्या किसी मुफ़लिस की कबा है जिस्में
हर घड़ी दर्द के पैबन्द लगे जाते हैं
लेकिन अब ज़ुल्म की मीयाद के दिन थोड़े हैं
इक ज़रा सबर, कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं
अरसा-ए-दहर की झुलसी हुयी वीरानी में
हमको रहना है तो यूं ही तो नहीं रहना है
अजनबी हाथों के बे-नाम गरांबार सितम
आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है
ये तिरे हुस्न से लिपटी हुयी आलाम की गर्द
अपनी दो-रोज़ा जवानी की शिकसतों का शुमार
चांदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द
दिल की बे-सूद तड़प, जिस्म की मायूस पुकार
चन्द रोज़ और मिरी जान फ़कत चन्द ही रोज़

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मुझसे पहली-सी मुहब्बत मिरे महबूब न मांग
मैनें समझा था कि तू है तो दरख़शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तकदीर नगूं हो जाये
यूं न था, मैनें फ़कत चाहा था यूं हो जाये

और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वसल की राहत के सिवा

अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिसम
रेशमो-अतलसो-किमख्वाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लिबड़े हुए, ख़ून में नहलाये हुए
जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुयी गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वसल की राहत के सिवा
मुझसे पहली-सी मुहब्बत मिरे महबूब न मांग

वो जिसकी दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँ
वो हुस्न जिसकी तमन्ना में जन्नतें पिन्हाँ 

हज़ार फित्ने तहे-पा-ए-नाज़ ख़ाकनशीं
हर एक निगाह ख़मारे-शबाब से रंगीं 

शबाब, जिससे तख़य्युल पे बिजलियाँ बरसें
विक़ार  जिसकी रक़ाबत को शोख़ियाँ तरसें 

अदा-ए-लग़्ज़िशे-पा पर क़यामतें क़ुर्बां
बयाज़े-रुख़ पे सहर की सबाहतें क़ुर्बां 

सियाह ज़ुल्फ़ों में वारफ़्तः नकहतों तो हुजूम
तवील रातों की ख़्वाबीदः राहतों का हुजूम 

वो आँख जिसके बना’व पे ख़ालिक इतराये
ज़बाने-शे’र को तारीफ़ करते शर्म आये 

वो होंठ फ़ैज़ से जिनके बहारे-लालःफरोश
बहिश्त-ओ-कौसर-ओ-तसनीम-ओ-सलसबील ब-दोश 

गुदाज़-जिस्म, क़बा जिस पे सज के नाज़ करे
दराज़ क़द जिसे सर्वे-सही नमाज़ करे 

ग़रज़ वो हुस्न जो मोहताज-ए-वस्फ़-ओ-नाम नहीं
वो हुस्न जिसका तस्सवुर बशर का काम नहीं 

किसी ज़माने में इस रहगुज़र से गुज़रा था
ब-सद-ग़ुरूरो-तजम्मुल इधर से गुज़रा था 

और अब ये राहगुज़र भी है दिलफरेब-ओ-हसीं
है इसकी ख़ाक मे कैफ़-ए-शराब-ओ-शे’र मकीं 

हवा मे शोख़ी-ए-रफ़्तार की अदाएँ हैं
फ़ज़ा मे नर्मी-ए-गुफ़्तार की सदाएँ हैं 

गरज़ वो हुस्न अब इस जा का ज़ुज़्वे-मंज़र है
नियाज़-ए-इश्क़ को इक सिज्दःगह मयस्सर है

मिरी जां अब भी अपना हुस्न फेर दे मुझको
अभी तक दिल में तेरे इश्क की कन्दील रौशन है
तिरे जलवों से बज़मे-ज़िन्दगी जन्नत-ब-दामन है
मिरी रूह अब भी तन्हायी में तुझको याद करती है
हर इक तारे-नफ़स में आरज़ू बेदार है अब भी
हर इक बेरंग साअत मुंतज़िर है तेरी आमद की
निगाहें बिछ रही हैं रास्ता ज़रकार है अब भी

मगर जाने-हज़ीं सदमे सहेगी आख़िरश कब तक
तिरी बे-मेहर्यों पे जान देगी आख़िरश कब तक
तिरी आवाज़ में सोयी हुयी शीरीनीयां आख़िर
मिरे दिल की फ़सुरद खिलवतों में न पायेंगी
ये अश्कों की फ़रावानी में धुन्दलायी हुयी आंखें
तिरी रानाईयों की तमकनत को भूल जायेंगी

पुकारेंगे तुझे तो लब कोई लज़्ज़त न पायेंगे
गुलू में तेरी उल्फ़त के तराने सूख जायेंगे

मबादा यादहा-ए-अहदे-माज़ी महव हो जायें
ये पारीना फ़साने मौजहा-ए-ग़म में खो जायें
मिरे दिल की तहों से तेरी सूरत धुल के बह जाये
हरीमे-इश्क की शमअ-ए-दरख़शां बुझके रह जाये
मबादा अजनबी दुनिया की ज़ुल्मत घेर ले तुझको
मिरी जां अब भी अपना हुस्न फेर दे मुझको

गुल हुई जाती है अफ़्सुर्दा सुलगती हुई शाम 
धुल के निकलेगी अभी चश्मा-ए महताब से रात 
और मुश्ताक़ निगाहों से सुनी जाएगी 
और उन हाथों से मस होंगे यह तरसे हुए हाथ 
उनका आँचल है कि रूख़सार कि पैराहन है 
कुछ तो है जिससे हुई जाती है चिलमन रंगीं 
जाने उस ज़ुल्फ़ की मौहूम घनी छाओं में 
टिमटिमाता है वो आवेज़ा अभी तक कि नहीं 

आज फिर हुस्नेदिल आरा की वही धज होगी 
वही ख़्वाबीदा सी आँखें, वही काजल की लकीर 
रंगे रुख़सार पे हल्का सा वो ग़ाज़े का गु़बार 
संदली हाथ पे धुँदली-सी हिना की तहरीर 

अपने अफ़्कार की, अशआर की दुनिया है यही 
जाने-मज़मूं है यही, शाहिदे-माना है यही 
आज तक सुर्ख़-ओ-सियह सदियों के साए के तले 
आदम-ओ-हव्वा की औलाद पे क्या गुज़री है 
मौत और ज़ीस्त की रोज़ाना सफ़ आराई में 
हम पे क्या गुज़रेगी, अजदाद पे क्या गुज़री है? 
इन दमकते हुए शहरों की फ़रावाँ मख़लूक़ 
क्यूँ फ़क़त मरने की हसरत में जिया करती है 
यह हसीं खेत फटा पड़ता है जोबन जिनका 
किस लिए इनमें फ़क़त भूख उगा करती है? 
यह हर इक सम्त, पुर-असरार कड़ी दीवारें 
जल बुझे जिनमें हज़ारों की जवानी के चराग़ 
यह हर इक गाम पे उन ख़्वाबों की मक़्तल गाहें 
जिनेके पर-तव से चराग़ाँ हैं हज़ारों के दिमाग़ 

यह भी हैं, ऐसे कई और भी मज़मूँ होंगे। 
लेकिन उस शोख़ के आहिस्ता से ख़ुलते हुए होंठ ! 
हाय उस जिस्म के कमबख़्त, दिलावेज़ ख़ुतूत ! 
आप ही कहिए, कहीं ऐसे भी अफ़्सूँ होंगे 

अपना मौजू-ए-सुख़न इनके सिवा और नहीं 
तब'अ-ए-शायर का वतन इन के सिवा और नहीं

ख़ुदा वह वक्त न लाये कि सोगवार हो तू
सुकूं की नींद तुझे भी हराम हो जाये
तिरी मसर्रत-ए-पैहम तमाम हो जाये
तिरी हयात तुझे तलख़ जाम हो जाये

ग़मों से आईना-ए-दिल गुदाज़ हो तेरा
हुजूम-ए-यास से बेताब होके रह जाये
वफ़ूर-ए-दर्द से सीमाब होके रह जाये
तिरा शबाब फ़कत ख्वाब होके रह जाये

गुरूर-ए-हुस्न सरापा नयाज़ हो तेरा
तवील रातों में तू भी करार को तरसे
तिरी निगाह किसी ग़मगुसार को तरसे
ख़िज़ांरसीदा तमन्ना बहार को तरसे

कोई जबीं न तिरे संग-ए-आसतां पे झुके
कि जिनस-ए-इजज़ो-अकीदत से तुझको शाद करे
फ़रेब-ए-वादा-ए-फ़र्दा पे ऐतमाद करे
ख़ुदा वह वक्त न लाये कि तुझको याद आये

वह दिल कि तेरे लिए बेकरार अब भी है
वह आंख जिसको तिरा इंतज़ार अब भी है