आई बसंत और खुशियाँ लायी
कोयल गाती मधुर गीत प्यार के
चारों और जैसे सुगंध छाई
फूल अनेकों महके बसंत के

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था यहाँ बहुत एकान्त, बंधु
नीरव रजनी-सा शान्त, बंधु
दुःख की बदली-सा क्लान्त, बंधु
नौका-विहार दिग्भ्रान्त, बंधु !

तुम ले आये जलती मशाल
उर्जस्वित स्वर देदीप्य भाल
हे ! कविता के भूधर विशाल
गर्जित था तुममें महाकाल

भाषा को दे नव-संस्कार
वर्जित-वंचित को दे प्रसार
कविता-नवीन का समाहार
करने में जीवन दिया वार

विस्मित है जग लख, महाप्राण !
अप्रतिहत प्रतिभा के प्रमाण
नर-पुंगव तुमने सहे बाण
निष्कवच और बिन सिरस्त्राण

अब श्रेय लूटने को अनेक
दादुर मण्डलियाँ रहीं टेक
कैसा था साहित्यिक विवेक
छिटके थे करके एक-एक

झेले थे कितने दाँव बंधु
दृढ़ रहे तुम्हारे पाँव बंधु
है, यह मुर्दों का गाँव बंधु
बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु

जैसे बहन 'दा' कहती है

ऐसे किसी बँगले के किसी तरु( अशोक?) पर कोइ चिड़िया कुऊकी

चलती सड़क के किनारे लाल बजरी पर चुरमुराये पाँव तले

ऊँचे तरुवर से गिरे

बड़े-बड़े पियराये पत्ते

कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहायी हो-

खिली हुई हवा आयी फिरकी-सी आयी, चली गयी।

ऐसे, फ़ुटपाथ पर चलते-चलते-चलते

कल मैंने जाना कि बसन्त आया।


और यह कैलेण्डर से मालूम था

अमुक दिन वार मदनमहीने कि होवेगी पंचमी

दफ़्तर में छुट्टी थी- यह था प्रमाण

और कविताएँ पढ़ते रहने से यह पता था

कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल

आम बौर आवेंगे

रंग-रस-गन्ध से लदे-फँदे दूर के विदेश के

वे नन्दनवन होंगे यशस्वी

मधुमस्त पिक भौंर आदि अपना-अपना कृतित्व

अभ्यास करके दिखावेंगे

यही नहीं जाना था कि आज के नग्ण्य दिन जानूंगा

जैसे मैने जाना, कि बसन्त आया।