लेकर मौसम की बहार
आया बसंत ऋतू का त्योहार
आओ हम सब मिलके मनाये
दिल में भर के उमंग और प्यार
बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं
हैप्पी बसंत पंचमी

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मैं कविता रचता हूं
रचता क्या हूं
प्रियतमाओं के मुखड़े निहारता हूं
और पत्थरों से सिर टकराता हूं ।
मैं कविता रचता हूं
फूलों का रस और रसों की सुगन्ध
इस तरह चुरा लेता हूं
जिस तरह किसी के आंख का काजल
कोई चुरा लेता है।
मैं रचता हूं कविता
और चुपचाप
गिन लेता हूं पंख
उड़ती चिड़िया के
कितने पर है उसकी उड़ान ।
मैं कविता रचता हूं
किशोरीलाल की झोपड़ी में बैठे
और रांधता हूं
बच्चों को खुश करने के लिए गारगोटियों की सब्जी ।
मैं रचता हूं कविता
तसलीमा नसरीन की
आंखों के आंसू
अपनी आंखों में महसूसते हुए
कि क्यों एक नारी को समूचा एशिया महाव्दिप
निष्कासित करने के लिए उतारू है।
मैं इसलिए कविता रचता हूं कि
बगावत की मेरी आवाज़
जड़हृदयों के भीतर तक चोट कर जाए
और कहीं से तो
एक चिंगारी उठे।
मैं कविता रचता हूं
क्योंकि आप भी समझ लें कि
कविता रचने के बिना
मैं रह नहीं सकता ।

कहीं क्या छूट गया ?
कहीं कुछ छूट गया ?
लम्बे अरसे से/तुम्हारा/किसी का भी
खत नही आया
खाली-खाली सा है रास्ता
डाकिया आता है
दस्तक देकर लौट जाता है
खत नही
लौटते हुए डाकिये की
पीठ भर दिख पाती है
उसके कन्धे पर लटके थैले में
कई सारे खत हैं
तरह-तरह की बातें है उनमें
उनकी तफसील बयान करना-नामुमकिन है
इतने सारे खत 
मगर मेरे लिये एक भी नही

दरवाजे की दस्तक से दौड़ कर आता हूं
दरवाजा खोलते-खोलते
एक लिफाफा देहरी पर छोड़ कर
चला जाता है, वह
सुनसान गली में
अपने दरवाजे पर खड़ा हूं मैं
हाथ में लिफाफा लिये
लिफाफे पर मेरा पता लिखा है
मगर उसके अन्दर कुछ भी नही है
लिफाफा खाली है
हाय राम ! अब क्या करूँ ?
पूरा का पूरा बसन्त गुजर गया
मेरे नाम -
मौसम का कोई संदेश ही नहीं आया
अनगिनत फूल खिले सृष्टि में
मैं कोई कविता ही नहीं लिख पाया।

मस्ती से भरके जबकि हवा
सौरभ से बरबस उलझ पड़ी
तब उलझ पड़ा मेरा सपना
कुछ नये-नये अरमानों से;
गेंदा फूला जब बागों में
सरसों फूली जब खेतों में
तब फूल उठी सहस उमंग
मेरे मुरझाये प्राणों में;
कलिका के चुम्बन की पुलकन
मुखरित जब अलि के गुंजन में
तब उमड़ पड़ा उन्माद प्रबल
मेरे इन बेसुध गानों में;
ले नई साध ले नया रंग
मेरे आंगन आया बसंत
मैं अनजाने ही आज बना
हूँ अपने ही अनजाने में!
जो बीत गया वह बिभ्रम था,
वह था कुरूप, वह था कठोर,
मत याद दिलाओ उस काल की,
कल में असफलता रोती है!
जब एक कुहासे-सी मेरी
सांसें कुछ भारी-भारी थीं,
दुख की वह धुंधली परछाँही
अब तक आँखों में सोती है।
है आज धूप में नई चमक
मन में है नई उमंग आज
जिससे मालूम यही दुनिया
कुछ नई-नई सी होती है;
है आस नई, अभिलास नई
नवजीवन की रसधार नई
अन्तर को आज भिगोती है!
तुम नई स्फूर्ति इस तन को दो,
तुम नई नई चेतना मन को दो,
तुम नया ज्ञान जीवन को दो,
ऋतुराज तुम्हारा अभिनन्दन!