मां सरस्वती का वरदान हो आपको,

हर दिन नई मिले ख़ुशी आपको,

दुआ हमारी है खुदा से ऐ दोस्त,

जिन्दगी में सफलता हमेशा मिले आपको।

Related Basant Panchmi Shayari :

चादर-सी ओढ़ कर ये छायाएँ
तुम कहाँ चले यात्री, पथ तो है बाएँ।

धूल पड़ गई है पत्तों पर डालों लटकी किरणें
छोटे-छोटे पौधों को चर रहे बाग में हिरणें,
दोनों हाथ बुढ़ापे के थर-थर काँपे सब ओर
किन्तु आँसुओं का होता है कितना पागल ज़ोर-
बढ़ आते हैं, चढ़ आते हैं, गड़े हुए हों जैसे
उनसे बातें कर पाता हूँ कि मैं कुछ जैसे-तैसे।
पर्वत की घाटी के पीछे लुका-छिपी का खेल
खेल रही है वायु शीश पर सारी दनिया झेल।

छोटे-छोटे खरगोशों से उठा-उठा सिर बादल
किसको पल-पल झांक रहे हैं आसमान के पागल?
ये कि पवन पर, पवन कि इन पर, फेंक नज़र की डोरी
खींच रहे हैं किसका मन ये दोनों चोरी-चोरी?
फैल गया है पर्वत-शिखरों तक बसन्त मनमाना,
पत्ती, कली, फूल, डालों में दीख रहा मस्ताना।

वक़्त जहाँ पैंतरा बदलता है
बेगाना
नस्लों के
काँपते जनून पर
एक-एक पत्ती जब
जंगल का रुख अख़्तियार करे

आ !
इसीलिए कहता हूँ, आ
एक पैना चाकू उठा
ख़ून कर
क्यों कि यही मौसम है :
काट
कविता का गला काट
लेकिन मत पात
रद्दी के शब्दों से भाषा का पेट
इससे ही
आदमी की सेहत
बिगड़ती है ।

हलका वह होता है,
लेकिन हर हाल में
आदमी को बचना है
गिरी हुई भाषा के खोल में
चेहरा छिपाता है
लेकिन क्या बचता है ?

बचता कत्तई नहीं है।

ऎसे में
ऎसा कर
ढाढ़स दे
पैसा भर

इतना कह
भाई रे !
करम जले मौसम का
नंगापन
नंगई नहीं है।

आ मरदे !
बैठा है पेड़ पर
विधवा के बेटे-सा
फक्कड़-मौलान

नीचे उतर
आदमी के चेहरे को
हँसी के जौहर से
भर दे।
परती पड़े चेहरों पर
कब्ज़ा कर।
हलकू को कर जबर।

बसंत आएगा इस वीरान जंगल में जहाँ

वनस्पतियों को सिर उठाने के ज़ुर्म में

पूरा जंगल आग को सौंप दिया गया था

वसन्त आएगा दबे पाँव हमारे-तुम्हारे बीच

संवाद कायम करेगा उदास-उदास मौसम में

बिजली की तरह हँसी फेंक कर बसंत

सिखाएगा हमें अधिकार से जीना


पतझड़ का आख़िरी बैंजनी बदरंग पत्ता समय के बीच

फ़ालतू चीज़ों की तरह गिरने वाला है

बेआवाज़ एक ठोस शुरूआत

फूल की शक्ल में आकार लेने लगी है


मैंने देखा बंजर धाती पर लोग बढ़े आ रहे हैं

कंधे पर फावड़े और कुदाल लिए

देहाती गीत गुनगुनाते हुए

उनके सीने तने हुए हैं

बादल धीरे-धीरे उफ़क से ऊपर उठ रहे हैं

ख़ुश्गवार गंधाती हवा उनके बीच बह रही है


एक साथ मिलकर कई आवाज़ें जब बोलती हैं तो

सुननेवालों के कान के परदे हिलने लगते हैं

वे खिड़कियाँ खोलकर देखते हैं

दीवार में उगे हुए पेड़ की जड़ों से

पूरी इमारत दरक गई है

तीन बाई दो की उस पथरीली बेंच पर
तुमने बैठते ही पूछा था कि
बसन्त से पहले झड़े हुए पत्‍तों का
उल्काओं से क्या रिश्ता है
पसोपेश में पड़ गया था मैं यह सोचकर कि
उल्काएँ कौनसे बसंत के पहले गिरती हैं कि
पृथ्वी के अलावा सृष्टि में और कहाँ आता है बसन्त
चंद्रमा से पूछा मैंने तो उसने कहा 
‘मैं तो ख़ुद रोज़-रोज़ झड़ता हूँ
मेरे यहाँ हर दूसरे पखवाड़े बसन्त आता है
लेकिन उल्काओं के बारे में नहीं जानता मैं’
पृथ्वी ने भी ऐसा ही जवाब दिया
‘मैं तो ख़ुद एक टूटे हुए तारे की कड़ी हूँ
उल्काओं के बारे में तो जानती हूँ मैं
लेकिन बसंत से उनका रिश्ता मुझे पता नहीं’
एक गिरती हुई उल्का ने ही
तुम्हारे सवाल का जवाब दिया
‘ब्रह्माण्ड एक वृक्ष है और ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र उसकी शाखाएँ हैं
हम जैसे छोटे सितारे उसके पत्‍ते हैं
पृथ्वी पर जब बसन्त आता है तो
हम देखने चले आते हैं
झड़े हुए पत्‍ते हमारे पिछले बरस के दोस्त हैं’ 

आओ हम दोनों मिलकर 
इस बसंत में आयी हुई उल्काओं का स्वागत करें